एआई की मनमानी पर दुनिया भर में कानूनी शिकंजा: भारत, यूरोप और अमेरिका में बने कड़े नियम, बिना अनुमति डेटा इस्तेमाल पर रोक

जनरेटिव एआई के दौर में कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा की रक्षा; भारत ला रहा है 'वन नेशन, वन लाइसेंस' मॉडल, यूरोप में डीपफेक लेबलिंग अनिवार्य।

24 May 2026  |  101

 

 

नई दिल्ली: चैटजीपीटी (ChatGPT), सोरा (Sora) और मिडजर्नी (Midjourney) जैसे जनरेटिव एआई टूल्स ने तकनीकी और रचनात्मक दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन एआई की यह तेजी से बढ़ती ताकत अब वैश्विक स्तर पर कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) कानूनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। दुनिया भर की सरकारें अब एआई कंपनियों द्वारा कलाकारों, लेखकों और पब्लिशर्स का डेटा बिना अनुमति इस्तेमाल करने (डेटा माइनिंग) पर सख्त रुख अपना रही हैं।

भारत, यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे देशों ने अब एआई रेगुलेशन के लिए कड़े कानूनी ढांचे तैयार कर लिए हैं, जिससे आने वाले समय में पूरी एआई इंडस्ट्री का स्वरूप बदलने जा रहा है।

भारत: एआई कंटेंट पर कड़े नियम और रॉयल्टी वसूलने की तैयारी

भारत ने एआई के नियमन के लिए एक बेहद सख्त और संतुलित रास्ता चुना है, जो क्रिएटर्स के हितों की रक्षा करता है:

3 घंटे में हटाना होगा डीपफेक: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा फरवरी 2026 में लागू किए गए नए आईटी नियमों के तहत किसी भी एआई जनित (AI-Generated) वीडियो, फोटो या ऑडियो पर स्पष्ट एआई लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। यदि कोई भ्रामक या डीपफेक कंटेंट सामने आता है, तो गूगल, मेटा और एक्स (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म्स को उसे 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। ऐसा न करने पर वे अपना सेफ हार्बर प्रोटेक्शन खो देंगे।

'वन नेशन, वन लाइसेंस' मॉडल: भारत का डीपीआईआईटी (DPIIIT) विभाग जनरेटिव एआई कंपनियों से रॉयल्टी वसूलने के लिए 'वन नेशन, वन लाइसेंस' मॉडल पर काम कर रहा है। इसके तहत टेक कंपनियों को भारतीय क्रिएटर्स के कंटेंट पर अपना एआई ट्रेन करने के लिए लाइसेंस लेना होगा और अपनी कमाई का एक हिस्सा रॉयल्टी के रूप में क्रिएटर्स को देना होगा।

यूरोपीय संघ: लागू हुआ दुनिया का पहला व्यापक 'EU AI Act'

यूरोपीय संघ (EU) ने एआई को नियंत्रित करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा और पहला व्यापक कानूनी ढांचा 'EU AI Act' लागू कर दिया है:

जोखिम आधारित वर्गीकरण: इस कानून के तहत एआई सिस्टम्स को उनके जोखिम (Risk) के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में बांटा गया है। फेशियल रिकग्निशन और निजी डेटा स्क्रैपिंग जैसी तकनीकों पर सबसे सख्त प्रतिबंध हैं।

अनिवार्य मार्क: अगस्त 2026 से यूरोप में सभी एआई जनित समाचारों और डीपफेक कंटेंट पर स्पष्ट रूप से 'AI-Generated' का मार्क लगाना कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा।

अमेरिका: 'इंसानी रचनात्मकता' को प्राथमिकता, एआई क्रिएशन को नो कॉपीराइट

अमेरिका में एआई और कॉपीराइट की लड़ाई अदालतों के जरिए एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है:

थेलर बनाम पर्लमटर केस (मार्च 2025): अमेरिकी अदालत और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह साफ कर दिया कि केवल मशीन या एआई द्वारा बनाई गई पेंटिंग, टेक्स्ट या वीडियो को कॉपीराइट सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

मानव नियंत्रण जरूरी: अमेरिका में कॉपीराइट का अधिकार तभी मिलेगा जब अंतिम कंटेंट पर किसी इंसान का वास्तविक रचनात्मक नियंत्रण रहेगा और एआई का इस्तेमाल केवल एक माध्यम के रूप में किया गया हो।

यूके और सिंगापुर का अलग नजरिया

जहाँ यूनाइटेड किंगडम (UK) एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है जिसमें कंटेंट क्रिएटर्स को एआई ट्रेनिंग से अपने डेटा को बाहर रखने (Opt-Out) का विकल्प मिलेगा; वहीं सिंगापुर ने इस मामले में दुनिया का सबसे उदार रुख अपनाया है। सिंगापुर में एआई कंपनियों को डेटा ट्रेनिंग की खुली अनुमति दी गई है, बशर्ते उनके पास उस डेटा तक पहुंचने का वैध जरिया हो।

भविष्य की राह: वैश्विक स्तर पर बदलते इन कानूनों से एक बात साफ है कि बिना अनुमति डेटा माइनिंग का दौर अब खत्म हो रहा है। आने वाले समय में ओपनएआई (OpenAI), माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियों को कानूनी मुकदमों से बचने के लिए कंटेंट लाइसेंसिंग, पारदर्शिता और रॉयल्टी मॉडल पर ही निर्भर रहना होगा।

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