बिजनेस व कॉर्पोरेट डेस्क, नई दिल्ली। कोरोना महामारी के बाद भारत ने वैश्विक मंच पर खुद को दुनिया की अगली बड़ी 'मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति' के रूप में मजबूती से पेश किया है। देश में एप्पल (Apple) के सप्लायर्स ने पैर पसारे, सेमीकंडक्टर प्लांट्स की नींव रखी गई और इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में ऐतिहासिक उछाल देखा गया। लेकिन इस बीच पड़ोसी देश चीन के एक नए रणनीतिक फैसले (China New Export Rules) ने भारत के 120 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण (Manufacturing) के सपने के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
चीन ने अपने यहां नए स्टेट काउंसिल डिक्रीस 834 और 835 (Decrees 834 & 835) लागू किए हैं। इसके तहत एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी, महत्वपूर्ण मशीनों और बेहद अहम 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' (Rare Earth Elements) के निर्यात पर पाबंदियां और सख्ती बढ़ा दी गई है। इस फैसले का सीधा और गहरा असर भारत के उभरते इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ने की आशंका है।
चीन की मशीनों और कच्चे माल पर निर्भरता बनी कमजोरी
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट का सफर बेहद शानदार रहा है। साल 2015 में जो एक्सपोर्ट महज 8.6 अरब डॉलर था, वह साल 2025 में बढ़कर 47 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सरकार को उम्मीद है कि साल 2026 के अंत तक यह आंकड़ा 120 अरब डॉलर को छू लेगा।
लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि भारत की कई फैक्ट्रियां और असेंबली यूनिट्स आज भी चीन से आने वाली आधुनिक मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और कच्चे माल पर निर्भर हैं। इंडस्ट्री के शीर्ष अधिकारियों के मुताबिक, चीन के इन नए नियमों की भनक लगते ही भारतीय कंपनियों ने चीनी सप्लायर्स के साथ इमरजेंसी बैठकें शुरू कर दी हैं, ताकि प्रोडक्शन और नए प्रोजेक्ट्स को रुकने से बचाया जा सके।
ऑटो सेक्टर में स्थिति और भी गंभीर
ऑटोमोबाइल सेक्टर के मोर्चे पर चुनौतियां और भी बड़ी हैं। भारत वित्त वर्ष 2025 (FY25) में अपने कुल ऑटो कंपोनेंट्स का करीब 26 फीसदी हिस्सा अकेले चीन से आयात करता है, जिसमें हाई-वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक्स और क्रिटिकल चिप्स शामिल हैं।
Cars Unlimited के फाउंडर मुस्तफा सिंगापुरवाला ने इस पर चिंता जताते हुए चेतावनी दी है कि चीन अब सिर्फ व्यापारिक दबाव नहीं बना रहा, बल्कि अपनी मजबूत सप्लाई चेन को एक 'हथियार' की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इन नए नियमों के तहत चीन उन कंपनियों पर भी कार्रवाई कर सकता है, जो अपना प्रोडक्शन चीन से बाहर (जैसे भारत) शिफ्ट करने की कोशिश कर रही हैं।
ड्रैगन की काट: देश में बनेंगे 50 नए इंडस्ट्रियल पार्क
केंद्र सरकार इस चीनी खतरे से पूरी तरह वाकिफ है और इसकी काट के लिए बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस दिशा में बड़ी रणनीति का संकेत देते हुए कहा है कि सरकार देश में 50 नए इंडस्ट्रियल पार्क स्थापित करने जा रही है, ताकि कच्चे माल और कंपोनेंट्स के मामले में भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ाया जा सके और चीन पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
विशेषज्ञों की राय: सिर्फ असेंबली नहीं, रिसर्च और टेक्नोलॉजी पर देना होगा जोर
NXTCELL Mobility के सीईओ अतुल विवेक का मानना है कि भारत के पास ग्लोबल हब बनने का यह बेहतरीन मौका है, लेकिन इसके लिए केवल असेंबली यूनिट्स लगाने से काम नहीं चलेगा। भारत को घरेलू स्तर पर कंपोनेंट निर्माण, रिसर्च और डीप-टेक क्षमताओं को लॉन्ग-टर्म रणनीति के तहत मजबूत करना होगा।
LEDX Technology के एमडी संकेत रामभिया के मुताबिक, दुनिया अब चीन पर पूरी तरह निर्भर रहने के खतरे को समझ चुकी है। कई वैश्विक कंपनियां 'चीन+1' की नीति अपनाकर भारत का रुख कर रही हैं, और भारत के लिए इस मौके को भुनाना बेहद जरूरी है।
यह साफ है कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए चीन अपनी सप्लाई चेन की पकड़ को मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत की आगामी आर्थिक नीतियां और घरेलू विनिर्माण की रफ्तार ही इस चक्रव्यूह को तोड़ने का काम करेगी।