पेट्रोल-डीजल पर तेल कंपनियों को ₹7-8 प्रति लीटर का भारी नुकसान; कच्चे तेल में '85 डॉलर' का भाव ही बचाएगा

15 दिनों में ₹8 की बढ़ोतरी और एक्साइज ड्यूटी कटौती के बाद भी OMCs घाटे में; जेफरीज का दावा— सरकार को नॉन-डिफेंस कैपेक्स में करनी पड़ सकती है कटौती!

27 May 2026  |  46

 

 

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में जारी उतार-चढ़ाव ने भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म 'जेफरीज' (Jefferies) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू बाजार में पिछले 15 दिनों के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 4 बार में करीब ₹8 का इजाफा करने के बावजूद तेल कंपनियों को अभी भी ₹7 से ₹8 प्रति लीटर का भारी नुकसान (Under-recovery) उठाना पड़ रहा है।

इस घाटे से उबरने और 'नो-प्रॉफिट, नो-लॉस' यानी ब्रेक-ईवन (Breakeven) पॉइंट पर आने के लिए तेल कंपनियों को कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों के घटकर $85-$87 प्रति बैरल के स्तर पर आने की सख्त जरूरत है।

$85-$87 का ब्रेक-ईवन पॉइंट: क्यों घाटे में हैं कंपनियां?

जेफरीज के टॉप एनालिस्ट महेश नंदुरकर के अनुसार, रिटेल फ्यूल की कीमतों में हालिया 8% की बढ़ोतरी के बाद भी सरकारी तेल कंपनियां राजनीतिक कारणों और सीमित घरेलू पंप कीमतों की वजह से हाई इंटरनेशनल प्राइस का पूरा बोझ खुद उठा रही हैं।

जुलाई से $90 ब्रेंट क्रूड का अनुमान: जेफरीज का बेस केस अनुमान है कि जुलाई 2026 से ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकती है। अगर कीमतें इस स्तर पर रहीं और घरेलू दाम नहीं बढ़ाए गए, तो कंपनियों का नुकसान जारी रहेगा।

मार्केटिंग मार्जिन की शर्त: जब कच्चे तेल का भाव $85 प्रति बैरल से नीचे आएगा, तभी तेल कंपनियां सामान्य मार्केटिंग मुनाफा कमाना शुरू कर पाएंगी।

सरकार क्यों नहीं दे रही टैक्स में राहत? (राजकोषीय मजबूरी)

मार्च 2026 में सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में करीब 40% की कटौती की थी, जिससे कीमतें 10 साल के निचले स्तर पर आ गई थीं। केंद्र सरकार कंज्यूमर्स को दी गई इस राहत को वापस लेने के मूड में नहीं है।

बजट पर ₹90,000 करोड़ का दबाव सरकार वित्त वर्ष 2027 में राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को GDP के 4.3% के लक्ष्य पर रखने के लिए प्रतिबद्ध है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण फर्टिलाइजर सब्सिडी ₹30,000-₹40,000 करोड़ और एलपीजी सब्सिडी ₹20,000-₹30,000 करोड़ तक बढ़ सकती है। इसके अलावा, आईएमडी (IMD) द्वारा कमजोर मानसून (सामान्य से 8% कम बारिश) के अनुमान के चलते ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) पर खर्च ₹10,000-₹20,000 करोड़ बढ़ सकता है।

इस दोहरे वित्तीय दबाव के कारण सरकार तेल कंपनियों को कोई सीधी नकद भरपाई (Compensation) नहीं दे पा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इसकी भरपाई नॉन-डिफेंस कैपेक्स (गैर-रक्षा पूंजीगत व्यय) में कटौती करके करेगी।

क्या है सरकार और तेल कंपनियों के पास विकल्प?

अगर ब्रेंट क्रूड $90 पर बना रहता है, तो राजकोषीय रोडमैप को बनाए रखने के लिए सरकार के पास सीमित विकल्प बचते हैं:

फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी: आगामी दिनों में पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमतों को और बढ़ाना पड़ सकता है। यह राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि मुंबई में पेट्रोल और डीजल पहले ही क्रमशः ₹121 और ₹105 प्रति लीटर के ऐतिहासिक उच्चतम स्तर के करीब पहुंच चुके हैं।

नॉन-टैक्स रेवेन्यू बढ़ाना: सरकार ने सोने-चांदी पर कस्टम ड्यूटी 9% बढ़ाकर 15% कर दी है, जिससे ₹40,000-₹50,000 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। इसके अलावा, फ्यूल एक्सपोर्ट पर 'विंडफॉल टैक्स' से ₹5,000-₹10,000 करोड़ मिलने की उम्मीद है।

विनिवेश (Disinvestment): बजट में विनिवेश के लक्ष्यों को दोगुने से अधिक किया गया है ताकि गैर-कर राजस्व को मजबूती मिल सके।

निष्कर्ष: जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल $85-$87 के आरामदायक दायरे में वापस नहीं आ जाता, तब तक सरकारी तेल कंपनियों को ही 'शॉक एब्जॉर्बर' बनकर महंगे कच्चे तेल का यह भारी वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।

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