चांद पर जीवन की उम्मीदों को नया पंख: चंद्रयान-2 ने खोजी सतह के नीचे छिपी बर्फ, 'डबल शैडोड' क्रेटरों में मिला खजाना

अहमदाबाद की 'फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी' के वैज्ञानिकों का बड़ा दावा; माइनस 248°C तापमान वाले अंधेरे क्रेटरों में अरबों वर्षों से सुरक्षित है पानी।

28 May 2026  |  90

 

 

बेंगलुरु / अहमदाबाद। भारत के चंद्रयान-2 मिशन ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक और ऐतिहासिक कामयाबी दर्ज की है। मिशन से जुड़े भारतीय वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) क्षेत्र में सतह के नीचे भारी मात्रा में बर्फ होने के पुख्ता और मजबूत संकेत खोजे हैं। यह अभूतपूर्व खोज भविष्य में चंद्रमा पर भेजे जाने वाले मानव मिशनों और वहां बस्तियां बसाने की इंसानी तैयारियों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल 'एनपीजे स्पेस एक्सप्लोरेशन' (npj Space Exploration) में प्रकाशित हुआ है।

कैसे हुई यह बड़ी खोज?

अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर द्वारा भेजे गए अत्याधुनिक रडार डेटा का गहन विश्लेषण किया। गौरतलब है कि चंद्रयान-2 साल 2019 से लगातार चांद की परिक्रमा कर रहा है और बेहतरीन डेटा जुटा रहा है।

'डबल शैडोड' क्षेत्रों का रहस्य:

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बर्फ चांद की ऊपरी सतह पर नहीं, बल्कि जमीन के नीचे छिपी हुई है। यह ऐसे क्रेटरों (गड्ढों) में मौजूद है जहां सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। कुछ छोटे क्रेटर, बड़े क्रेटरों के भीतर स्थित हैं, जिसके कारण दोनों ही हमेशा घने अंधेरे में डूबे रहते हैं। इन्हें 'डबल शैडोड' क्षेत्र कहा जाता है। यहां का तापमान माइनस 248°C तक गिर जाता है, जिससे यह बर्फ अरबों वर्षों से बिना पिघले सुरक्षित जमी हुई है।

रडार तकनीक ने पकड़ा बर्फ का सिग्नल

इस खोज में चंद्रयान-2 में लगे ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रडार (DFSAR) ने सबसे अहम भूमिका निभाई।

काम करने का तरीका: यह रडार चांद की सतह पर लगातार माइक्रोवेव सिग्नल भेजता है और उनके परावर्तित (वापस लौटने) होने के पैटर्न को रिकॉर्ड करता है। चूंकि बर्फ, सिग्नलों को सामान्य पत्थरों और चांद की धूल (रेगोलिथ) के मुकाबले बिल्कुल अलग तरीके से रिफ्लेक्ट करती है, इसलिए इसे आसानी से पहचान लिया गया।

फॉस्टिनी क्रेटर का राज: इसरो (ISRO) के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने कुल 9 क्रेटरों का अध्ययन किया, जिनमें से 4 में बर्फ के मजबूत रडार संकेत मिले। इनमें सबसे खास फॉस्टिनी क्रेटर के अंदर स्थित 1.1 किलोमीटर चौड़ा एक छोटा क्रेटर है। इसकी बाहरी बनावट से संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में किसी उल्कापिंड की भीषण टक्कर के कारण सतह के नीचे दबी बर्फ बाहर की ओर फैल गई होगी।

भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए क्यों वरदान है यह बर्फ?

अंतरिक्ष विज्ञानियों का मानना है कि चांद पर पानी की मौजूदगी के बिना इंसानी मिशनों की कल्पना करना भी मुश्किल है। पृथ्वी से चांद पर पानी ले जाना बेहद खर्चीला और तकनीकी रूप से कठिन काम है।

चंद्रमा की बर्फ का उपयोगभविष्य का रणनीतिक लाभ
पीने योग्य पानीचांद पर रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जीवन रक्षक साबित होगा।
रॉकेट ईंधन (प्रोपेलेंट)पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग करके स्पेसक्राफ्ट के लिए ईंधन तैयार किया जा सकेगा।
डीप स्पेस लॉन्च पैडभविष्य में मंगल या अन्य ग्रहों पर जाने वाले यानों के लिए चांद एक रीफ्यूलिंग स्टेशन बन सकेगा।

 

यही वजह है कि दुनिया की तमाम बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां (जैसे नासा और इस्रो) इस समय चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने के लिए सबसे ज्यादा उत्सुक हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने इस सफलता पर गर्व जताते हुए कहा है कि यह खोज भविष्य के लूनर मिशनों और अंतरिक्ष संसाधनों के दोहन (Space Resource Utilization) की दिशा में एक क्रांतिकारी मील का पत्थर साबित होगी।

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