काठमांडू / नई दिल्ली: बचपन में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाले 36 वर्षीय अमेरिकी एथलीट टायलर एंड्रूज़ ने माउंट एवरेस्ट की छाती पर वो इतिहास लिख दिया है, जो आज तक दुनिया का कोई भी विदेशी पर्वतारोही नहीं कर सका। टायलर ने नेपाल की तरफ स्थित साउथ बेस कैंप से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी (8848.86 मीटर) तक की चढ़ाई महज 9 घंटे 55 मिनट में पूरी करके एक नया 'स्पीड रिकॉर्ड' अपने नाम कर लिया है।
नेपाल के कठिन और बेहद खतरनाक रास्ते से इस रफ्तार के साथ कामयाबी हासिल करने वाले टायलर दुनिया के पहले गैर-शेरपा (विदेशी) पर्वतारोही बन गए हैं।
ध्वस्त हुआ दो दशक पुराना 'अजेय' शेरपा रिकॉर्ड
टायलर एंड्रूज ने अपनी इस जादुई और अविश्वसनीय चढ़ाई से नेपाली पर्वतारोही ल्हाकपा गेलू शेरपा के 23 साल पुराने उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया है जिसे अब तक अजेय माना जा रहा था।
ल्हाकपा गेलू शेरपा का रिकॉर्ड (2003): 10 घंटे 56 मिनट।
टायलर एंड्रूज का नया रिकॉर्ड (2026): 9 घंटे 55 मिनट (1 घंटा 1 मिनट कम समय लिया)।
क्यों खास है यह जीत? अब तक नेपाल की तरफ से एवरेस्ट पर सबसे तेज चढ़ाई के सारे रिकॉर्ड सिर्फ स्थानीय शेरपा समुदाय के नाम ही थे। किलियन जोर्नेट जैसे जिन अन्य विदेशी एथलीटों ने पहले स्पीड रिकॉर्ड बनाए भी थे, उन्होंने तिब्बत (चीन) वाले तुलनात्मक रूप से सीधे रास्ते का इस्तेमाल किया था।
रात के अंधेरे में 'डेथ जोन' को चीरती रफ्तार
आम पर्वतारोहियों को एवरेस्ट के कम ऑक्सीजन वाले माहौल में खुद को ढालने में हफ्तों का समय लगता है और वे बेस कैंप से शिखर तक की दूरी तय करने में 4 से 7 दिन लगाते हैं। लेकिन टायलर ने इसे महज एक रात में मुमकिन कर दिखाया।
शुरुआत: टायलर ने बुधवार शाम 7:11 बजे बेस कैंप से दौड़ना शुरू किया, ठीक उसी समय जब खतरनाक खुंबू आइसफॉल पर अंधेरा घिर रहा था।
सफर: पूरी रात बिना रुके उन्होंने खुंबू आइसफॉल, वेस्टर्न कूम, ल्होत्से फेस और साउथ कोल के ऊपर स्थित जानलेवा 'डेथ जोन' को पार किया।
शिखर पर तिरंगा: उन्होंने रात भर में 14 किलोमीटर की दूरी तय की और 3,500 मीटर की सीधी वर्टिकल ऊंचाई चढ़कर गुरुवार सुबह 5:06 बजे एवरेस्ट के शिखर पर तिरंगे और अमेरिकी ध्वज को फहरा दिया।
चार नाकामियों के बाद पांचवें प्रयास में मिली कामयाबी
यह ऐतिहासिक कामयाबी टायलर को थाली में सजी हुई नहीं मिली। वे पिछले दो पर्वतारोहण सीजन में चार बार नाकाम हो चुके थे। कभी मौसम, कभी हिमस्खलन तो कभी उपकरण खराब होने (पिछले साल जूते खराब होने) से उन्हें वापस लौटना पड़ा था।
सबसे बड़ा झटका उन्हें एक हफ्ते पहले ही लगा, जब वे बिना ऑक्सीजन के सबसे तेज चढ़ाई का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने निकले थे। लेकिन बर्फीली हवाओं के कारण तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एयरलिफ्ट कर बेस कैंप लाया गया। टायलर ने सोशल मीडिया पर लिखा था:
"मुझे शारीरिक थकान से ज्यादा इस बात का तनाव रहता है कि पहाड़ पर कोई छोटी सी अजीब चीज, जिसका मेरी फिटनेस से कोई लेना-देना नहीं है, मेरी सालों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।"
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बेस कैंप में कुछ दिन आराम किया और रणनीति बदलते हुए इस बार 'ऑक्सीजन सपोर्ट' के साथ आखिरी दांव खेलने का फैसला किया।
कैसी थी टायलर की अनूठी रणनीति?
भले ही टायलर ऑक्सीजन-सहायता प्राप्त श्रेणी में चढ़ रहे थे, लेकिन उनका तरीका बेहद साहसिक था:
लगभग 6,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैंप II तक पहुंचने से पहले उन्होंने किसी भी बाहरी ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं किया।
वह पूरे रास्ते अकेले ही दौड़ रहे थे, जबकि 'एशियन ट्रेकिंग एजेंसी' के शेरपा गाइड उनके आगे ऑक्सीजन सिलेंडर, पानी और खाने के साथ बैकअप के तौर पर तैनात थे।
6 साल की उम्र में ब्लड कैंसर, आज दुनिया के 'स्पीड किंग'
टायलर की यह कहानी सिर्फ एक खेल रिकॉर्ड की नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति की है। जब वे महज 6 साल के थे, तब उन्हें एप्लास्टिक एनीमिया (एक दुर्लभ प्रकार का ब्लड कैंसर) का पता चला था, जिसमें शरीर में पर्याप्त रक्त कोशिकाएं नहीं बनतीं। कीमोथेरेपी के कई दर्दनाक दौर से गुजरने के बाद उन्होंने इस बीमारी को हराया।
आज वे दुनिया के सबसे बेहतरीन एंड्योरेंस (सहनशक्ति वाले) एथलीटों में गिने जाते हैं। एवरेस्ट से पहले वे नेपाल में मनास्लू और अमा डबलाम, तंजानिया में किलिमंजारो, अर्जेंटीना में एकॉनकागुआ और इक्वाडोर में कोटोपैक्सी जैसी दुनिया की कई गगनचुंबी चोटियों पर सबसे तेज चढ़ाई के रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं।
आधिकारिक मुहर का इंतजार
अभियान के लीडर दावा स्टीवन शेरपा ने गर्व से टायलर की टाइमिंग (9 घंटे 55 मिनट) की पुष्टि की है। हालांकि, इस रिकॉर्ड को अभी नेपाल के पर्यटन विभाग से आधिकारिक मंजूरी मिलना बाकी है। काठमांडू पहुंचने पर टायलर के GPS लॉग्स, शिखर की तस्वीरों और शेरपा गाइडों के बयानों की जांच की जाएगी, जिसके बाद इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर सरकारी मुहर लगा दी जाएगी।