बंगाल की सियासत में 'सिग्नेचर संकट': TMC विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर मामले में सीआईडी की एंट्री, हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स के साथ शुरू हुई छापेमारी

शोभनदेब चटर्जी को विपक्ष का नेता बनाने वाले प्रस्ताव पर उठे सवाल; 'लापता' विधायकों के भी मिले साइन, ममता सरकार पर विपक्ष का तंज— "पूरी सरकार ही नकली थी।"

29 May 2026  |  34

 

 

 

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब एक नए और बेहद गंभीर कानूनी-सियासी संकट में फंस गई है। पार्टी के भीतर 'सिग्नेचर संकट' (हस्ताक्षर विवाद) खड़ा हो गया है, जिसने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विधानसभा में पेश किए गए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर कई टीएमसी विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित 'असमानता और फर्जीवाड़े' की शिकायत के बाद राज्य की खुफिया एजेंसी सीआईडी (CID) ने कमान संभाल ली है।

विधानसभा सचिवालय की शिकायत पर हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज होने के बाद, सीआईडी की टीमें अब हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स (लेखन विशेषज्ञों) को साथ लेकर टीएमसी विधायकों के घरों पर सीधे छापेमारी और पूछताछ कर रही हैं।

क्यों शुरू हुआ 'फर्जी सिग्नेचर' का विवाद?

पूरा मामला विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन से जुड़ा है। तृणमूल कांग्रेस को वरिष्ठ नेता शोभनदेब चटर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के लिए विधानसभा में एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश करना था। पार्टी ने इस प्रस्ताव के समर्थन में 70 विधायकों के हस्ताक्षरों वाला एक पत्र विधानसभा सचिवालय को सौंपा।

विवाद तब गहराया जब इस पत्र में शामिल कई विधायकों ने खुद मीडिया और जांच एजेंसियों के सामने यह कबूल कर लिया कि उन्होंने इस प्रस्ताव पर कभी हस्ताक्षर किए ही नहीं थे। सवाल उठ रहा है कि अगर विधायकों ने साइन नहीं किए, तो फिर प्रस्ताव पर उनके नाम के आगे फर्जी दस्तखत किसने किए?

सीआईडी की रडार पर टीएमसी के दिग्गज, घरों पर दी दस्तक

फर्जीवाड़े की गहराई से जांच के लिए सीआईडी की टीम फॉरेंसिक और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स के साथ लगातार विधायकों के आवास पर पहुंच रही है।

चौरंगी की विधायक नयना बनर्जी, बेलेघाटा के विधायक कुणाल घोष और कैनिंग ईस्ट के विधायक बहारुल इस्लाम से लंबी पूछताछ के बाद शुक्रवार सुबह सीआईडी की टीम पूर्व मंत्री और बोलपुर के विधायक चंद्रनाथ सिन्हा के घर भी पहुंच गई।

जांच टीम विधायकों के वास्तविक हस्ताक्षरों के नमूने ले रही है ताकि विधानसभा में जमा किए गए दस्तावेजों से उनका मिलान किया जा सके।

"मैं तो मीटिंग में था ही नहीं, फिर साइन कहाँ से आया?" — विधायक बहारुल इस्लाम

इस पूरे घोटाले की पोल कैनिंग ईस्ट के विधायक बहारुल इस्लाम के बयान से खुलती नजर आ रही है। विधानसभा में जमा पत्र पर 6 मई की तारीख दर्ज है, जबकि बहारुल उस दिन कोलकाता में थे ही नहीं।

"जांच अधिकारी मुझसे यह जानना चाहते थे कि मैं 6 मई को कहाँ था? मैंने साफ बता दिया कि चुनाव के बाद हुई हिंसा के कारण मैं उस दिन अपने घर (भांगड़ा) पर ही था, कालीघाट में हुई पार्टी की मीटिंग में गया ही नहीं था। जब मैं वहां था ही नहीं, तो उस तारीख के दस्तावेज पर मेरा सिग्नेचर दिखाया जाना चौंकाने वाला है। जांच चल रही है, इसलिए मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा।" — बहारुल इस्लाम, विधायक, कैनिंग ईस्ट (TMC)

बंद कमरे का फैसला और प्रक्रियात्मक चूक

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस से प्रक्रियात्मक स्तर पर भी बड़ी चूक हुई है। नियमानुसार, विधायक दल के नेता या पदाधिकारियों का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से विधायक दल की बैठक में होना चाहिए था। लेकिन 6 मई को ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर हुई बैठक में सिर्फ हाथ उठाकर फैसला लेने का अधिकार ममता बनर्जी को सौंप दिया गया।

इसके बाद पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर वाला पत्र विधानसभा भेजा गया, जिसे सचिवालय ने तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद ही कथित तौर पर 70 विधायकों के हस्ताक्षर वाला यह विवादित पत्र तैयार किया गया, जिसमें तारीखों का बड़ा हेरफेर (19 मई की जगह 6 मई दर्ज होना) सामने आया है।

टीएमसी का बचाव बनाम विपक्ष का तीखा हमला

इस चौतरफा घिराव के बीच टीएमसी नेतृत्व इस कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बता रहा है। विधायक शोभनदेब चटर्जी ने कहा, "यह सिर्फ हमारे विधायकों को डराने-धमकाने और परेशान करने की साजिश है। नयना बनर्जी ने खुद साइन किया था, लेकिन उन्हें डराया जा रहा है।" वहीं नयना बनर्जी ने दावा किया कि उन्होंने सीआईडी की पूरी पूछताछ की वीडियोग्राफी करवाई है और वह यह मामला पार्टी स्तर पर देख रही हैं।

दूसरी तरफ, विपक्ष को टीएमसी को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। वरिष्ठ विपक्षी नेता और मंत्री दिलीप घोष ने इस मामले पर चुटकी लेते हुए तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, "यह कोई नई बात नहीं है, यहाँ तो पूरी सरकार ही नकली थी। जब पूरी व्यवस्था ही फर्जीवाड़े पर टिकी हो, तो विधायकों के नकली सिग्नेचर होना कौन सी बड़ी बात है।" सीआईडी की इस जांच ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में 'सिग्नेचर स्कैम' का यह जिन्न टीएमसी की मुश्किलें और बढ़ाने वाला है।

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