"ओन लेन, ओन पेस, ओन रेस... मैं अपनी ही रफ्तार से चलती हूँ" : करिश्मा कपूर

50 दिन कोलकाता में शूटिंग की बात सुन करिश्मा ने पहले ठुकरा दिया था 'ब्राउन' का ऑफर; हेलन और नो-मेकअप लुक को लेकर साझा किए दिलचस्प अनुभव

07 Jun 2026  |  113

 

 

करिश्मा कपूर: मैं अपने जीवन और करियर को लेकर हमेशा एक ही फलसफे पर यकीन रखती हूँ— 'ओन लेन, ओन पेस, ओन रेस' (मेरी अपनी राह, मेरी अपनी रफ्तार और मेरी अपनी रेस)। मैं किसी अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं हूँ, अपनी शर्तों पर जीती हूँ। मुझे खुशी है कि मेरे प्रशंसक मेरी इस बात को बखूबी समझते हैं और मुझे वैसा ही प्यार देते हैं, जैसी मैं हूँ।

सवाल: सुनने में आया है कि रीटा ब्राउन का यह रोल आपने पहले ठुकरा दिया था, ऐसा क्यों?

करिश्मा कपूर: (हंसते हुए) हाँ, यह सच है। मैं अब बहुत चुनिंदा काम करती हूँ और अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहती हूँ। जब मेकर्स इस शो का ऑफर लेकर आए, तो उन्होंने कहा कि शूटिंग के लिए मुझे 50-60 दिनों के लिए कोलकाता जाना होगा। यह सुनते ही मैंने साफ मना कर दिया कि इतनी लंबी कमिटमेंट मुझसे नहीं हो पाएगी। मैंने उनसे जाने को कह दिया। लेकिन वे मेकर्स भी अड़े रहे, दो दिन बाद जब मैंने पूरी स्क्रिप्ट पढ़ी और 'रीटा ब्राउन' के किरदार को समझा, तो मैं खुद को रोक नहीं पाई और तुरंत हाँ कह दिया।

सवाल: आपकी पुरानी चुलबुली और ग्लैमरस छवि के मुकाबले यह किरदार मानसिक रूप से कितना चुनौतीपूर्ण था?

करिश्मा कपूर: मैंने अपने करियर में 'फिजा', 'जुबैदा' और 'शक्ति' जैसी कई महिला-प्रधान और संजीदा फिल्में की हैं, लेकिन 'रीटा ब्राउन' उन सबसे बिल्कुल जुदा है। वह अंदर से पूरी तरह बिखरी हुई है, सिगरेट-शराब की आदी है, लेकिन साथ ही एक बेहद तेज-तर्रार और संवेदनशील पुलिस अधिकारी भी है। दर्शकों ने मुझे कभी इस रूप में नहीं देखा था। इस किरदार की बारीकियों को पकड़ने के लिए हमने काफी चर्चा की और बाकायदा एक्टिंग वर्कशॉप्स भी कीं।

"इतने सालों की ग्लैमरस छवि के बाद बिना मेकअप के कैमरे के सामने आने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। बल्कि, मैं खुद अपनी ही बनाई बंदिशें तोड़ना चाहती थी ताकि सिनेप्रेमी मुझे एक नए रूप में देख सकें।"

- करिश्मा कपूर (नो-मेकअप लुक पर)

सवाल: इस सीरीज से मशहूर अदाकारा हेलन जी भी वापसी कर रही हैं, उनके साथ काम का अनुभव कैसा रहा?

करिश्मा कपूर: हेलन आंटी को मैं बचपन से जानती हूँ, उन्होंने मेरे परिवार की कई पीढ़ियों के साथ काम किया है। मेरी मां (बबीता जी) मुझे अक्सर बताती थीं कि पुराने दौर में जब अन्य अभिनेत्रियां डांस स्टेप्स की घंटों प्रैक्टिस करती थीं, हेलन आंटी सिर्फ एक बार स्टेप्स देखकर सीधे 'वन टेक ओके' शॉट दे देती थीं। मैंने सैट पर उन्हें बताया कि मुझे भी डांस का शौक उन्हीं को देखकर लगा। इस उम्र में भी सेट पर उनकी एनर्जी और ग्रेस देखना मेरे लिए बेहद सम्मान की बात थी।

सवाल: आज के दौर में तो फीमेल-ओरिएंटेड फिल्में आम हैं, लेकिन 90 के दशक में 'फिजा' और 'जुबैदा' जैसी फिल्में चुनने का रिस्क आपने कैसे लिया?

करिश्मा कपूर: उस दौर में यह वाकई एक असाधारण और बड़ा फैसला था। तब ऐसी फिल्मों को 'आर्ट सिनेमा' या 'समानांतर सिनेमा' कहकर अलग कर दिया जाता था और कमर्शियल एक्टर्स ऐसी फिल्में करने से बचते थे। लेकिन जब श्याम बेनेगल और खालिद मोहम्मद मेरे पास आए, तो मैंने बिना सोचे तुरंत हामी भर दी।

मैं बतौर कलाकार अपनी कला को और निखारना चाहती थी। आज मुझे गर्व होता है कि दर्शकों ने मेरी 'बीवी नंबर 1' को जितना प्यार दिया, उतना ही सम्मान 'जुबैदा' और 'शक्ति' को भी मिला।

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