नई दिल्ली:
भारत सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को अधिक पारदर्शी बनाने और खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद आधुनिक और बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अनाज के बोरों पर 'क्यूआर कोड टैगिंग' (QR Code Tagging) योजना का दायरा बढ़ाने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य राशन के वितरण में होने वाली कतर-ब्योंत, हेराफेरी और अनाज की रीसाइक्लिंग को पूरी तरह से रोकना है।
तीन राज्यों में बढ़ेगा योजना का दायरा
खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश (दिसंबर 2025-जनवरी 2026) में चावल और पंजाब (अप्रैल-मई 2026) में गेहूं पर किए गए सफल पायलट प्रोजेक्ट के बाद अब इस योजना का विस्तार किया जा रहा है। मौजूदा मार्केटिंग सीजन में इसे तीन प्रमुख राज्यों में लागू किया जा रहा है:
आंध्र प्रदेश: लगभग 10 लाख टन चावल की खेप को कवर किया जाएगा।
तेलंगाना: करीब 5 लाख टन चावल पर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे।
ओडिशा: यहाँ से भी 5 लाख टन चावल की ट्रैकिंग होगी।
इस तरह इस चरण में कुल मिलाकर 20 लाख टन चावल को मिलिंग पॉइंट (राइस मिल) से लेकर वितरण केंद्रों तक क्यूआर कोड के जरिए ट्रैक किया जाएगा।
कैसे काम करेगी यह 'स्मार्ट' ट्रैकिंग प्रणाली?
"सप्लाई चेन को डिजिटल बनाने वाली इस प्रणाली के तहत हर एक बोरे के सफर की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी।"
मिलिंग स्टेज पर कोडिंग: जैसे ही राइस मिल में चावल की बोरियां तैयार होंगी, प्रत्येक बोरे पर एक यूनिक (अद्वितीय) क्यूआर कोड आवंटित कर दिया जाएगा। इस कोड में खरीद एजेंसी, केंद्र का नाम और फसल के सीजन (सत्र) की पूरी जानकारी दर्ज होगी।
रैंडम स्कैनिंग: जब ये बोरे एफसीआई के गोदामों में भंडारण के लिए पहुंचेंगे और बाद में जब राशन की दुकानों (Fair Price Shops) पर वितरण के लिए भेजे जाएंगे, तब अधिकारियों द्वारा इनकी रैंडम स्कैनिंग की जाएगी।
ई-पॉस (ePoS) से जुड़ाव: राशन दुकानों पर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट-ऑफ-सेल (ePoS) डिवाइस वितरण के समय इन क्यूआर कोड को कैप्चर करेंगे। इससे यह तुरंत वेरिफाई हो जाएगा कि लाभार्थी को किस सीजन का अनाज मिल रहा है।
80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सीधा फायदा
भारत में करीब 80 करोड़ से अधिक लोग राशन प्रणाली (PDS) पर निर्भर हैं। इस डिजिटल ऑडिट ट्रेल से न केवल चोरी और लीकेज रुकेगी, बल्कि सब्सिडी के भुगतान की प्रक्रिया भी बेहद आसान और सटीक हो जाएगी। वर्तमान में सब्सिडी का वितरण अंतिम चरण में होता है, जो सटीक डेटा मिलने के बाद अब सीधे और पारदर्शी तरीके से ऑटो-बिल जनरेशन के जरिए किया जा सकेगा। समाचार एजेंसी 'पीटीआई' (PTI) से बात करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "अब हम यह बारीक नजर रख पा रहे हैं कि अनाज किस एजेंसी का है और किस सीजन में खरीदा गया है, जिससे जवाबदेही तय करना आसान हो गया है।"
चुनौतियां और भविष्य की राह
तकनीकी रूप से यह योजना जितनी शानदार दिखती है, इसे जमीन पर उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए खरीद एजेंसियों, मिल मालिकों, ट्रांसपोर्टरों और राशन दुकानदारों के बीच बेहतरीन समन्वय (Coordination) की आवश्यकता होगी। साथ ही, ग्रामीण इलाकों और आखिरी छोर तक इंटरनेट व इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता भी बेहद जरूरी है।
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि यदि इन तीनों राज्यों में यह पायलट प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल रहता है, तो केंद्र सरकार इसे देशव्यापी स्तर पर लागू करने पर विचार करेगी। भारत का यह कदम दुनिया की अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं को पारदर्शी बनाने का एक बेहतरीन मॉडल साबित हो सकता है।