काठमांडू/नई दिल्ली:
वैश्विक जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो (El Niño) के प्रभाव ने अब अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) और 'चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज' द्वारा संयुक्त रूप से जारी ‘HKH मानसून आउटलुक 2026’ की रिपोर्ट ने एशिया महाद्वीप के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष करीब 3,500 किलोमीटर लंबे हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहने और तापमान औसत से अधिक रहने की गंभीर आशंका है।
8 देश और 200 करोड़ लोगों की सुरक्षा दांव पर
हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र को एशिया का 'वाटर टॉवर' कहा जाता है। यह क्षेत्र भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार तक फैला हुआ है। यह हिमालयी क्षेत्र गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्जे, मेकांग और इरावदी जैसी एशिया की 10 सबसे बड़ी नदी प्रणालियों का मुख्य स्रोत है। इन नदियों के पानी पर करीब 2 अरब (200 करोड़) लोगों की खाद्य और जल सुरक्षा टिकी हुई है। मानसून कमजोर होने से इन नदियों का जलप्रवाह बुरी तरह प्रभावित होगा, जिससे बड़े पैमाने पर सूखा और कृषि संकट पैदा हो सकता है।
खत्म हुआ प्राकृतिक 'जल भंडारण', अल-नीनो बना विलेन
इस वर्ष की सबसे बड़ी चिंता अल-नीनो की संभावित वापसी और सर्दियों में कम हुई बर्फबारी है। ऐतिहासिक रूप से, जब भी प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ता है (अल-नीनो स्थिति), तब दक्षिण एशिया में मानसूनी बारिश कमजोर हो जाती है। चूंकि इस क्षेत्र की 70 से 80 प्रतिशत वार्षिक वर्षा मानसूनी हवाओं पर निर्भर है, इसलिए इसका असर बहुत व्यापक होगा।
प्राकृतिक बफर का नुकसान:
आउटलुक के सह-लेखक सार्थक श्रेष्ठा के अनुसार, जनवरी से मार्च 2026 के दौरान इस क्षेत्र में बर्फबारी और हिमावरण (Snow Cover) सामान्य से कम रहा। इसका मतलब है कि मानसून शुरू होने से पहले ही नदियों को पानी देने वाला प्राकृतिक 'जल बफर' खत्म हो चुका है। अब लोगों को पूरी तरह बारिश, भूजल और प्राकृतिक झरनों पर निर्भर रहना होगा।
अजीब विरोधाभास: सूखा भी और जलप्रलय का खतरा भी!
मौसम विशेषज्ञों ने एक बेहद चौंकाने वाली चेतावनी दी है कि कम बारिश का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं का ग्राफ गिर जाएगा। इसके विपरीत, इस बार खतरा और भी खतरनाक रूप ले सकता है:
ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार होगी तेज: बढ़ता तापमान ग्लेशियरों को तेजी से पिघलाएगा, जिससे शुरुआती समय में नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाएगा।
GLOF का खतरा: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण 'ग्लेशियर झील फटने' (Glacial Lake Outburst Flood) की विनाशकारी घटनाएं बढ़ सकती हैं।
बादल फटना और अचानक बाढ़: भले ही कुल मानसूनी बारिश कम हो, लेकिन कम समय में होने वाली अत्यधिक तीव्र वर्षा (क्लाउडबर्स्ट) पहाड़ों में अचानक बाढ़ (Flash Floods) और भयानक भूस्खलन को जन्म दे सकती है।
हिमालयी क्षेत्र पर मंडराते चौतरफा खतरे: एक नजर में
| संकट का मुख्य कारण | संभावित प्रभाव और परिणाम |
|---|---|
| अल-नीनो का प्रभाव | दक्षिण एशियाई मानसून कमजोर होगा, कृषि और पेयजल पर सीधा दबाव। |
| कम हिमावरण (Snow Cover) | प्राकृतिक जल भंडारण समाप्त, भूजल और झरनों पर अत्यधिक निर्भरता। |
| बढ़ता तापमान | ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार तेज होगी, जिससे पहाड़ों का इकोसिस्टम बिगड़ेगा। |
| कम अवधि की तीव्र वर्षा | अचानक बाढ़ (Flash Floods) और भूस्खलन (Landslides) से तबाही। |
| ग्लेशियर झीलें (GLOF) | झीलों के फटने से निचले मैदानी इलाकों में अचानक जलप्रलय का संकट। |
आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए 'डबल अलर्ट'
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पहले से ही तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिससे वहां पारिस्थितिक (Ecological) समस्याएं गंभीर हो चुकी हैं। आईसीआईएमओडी के विशेषज्ञ मनीष श्रेष्ठा का कहना है कि यह स्थिति क्षेत्रीय सरकारों के लिए एक बड़ी परीक्षा है। आपदा प्रबंधन एजेंसियों को इस बार 'सूखा और बाढ़' दोनों विपरीत चुनौतियों से एक साथ निपटने के लिए अभी से कमर कसनी होगी। जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर का अंदेशा नहीं, बल्कि 2026 की दहलीज पर खड़ा एक कड़वा सच बन चुका है।