वाशिंगटन / तेहरान:
अमेरिका और ईरान के बीच करीब चार महीने से जारी युद्ध को रोकने के लिए एक ऐतिहासिक फ्रेमवर्क (MoU) पर सहमति तो बन गई है, लेकिन मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में स्थायी शांति अब भी एक दूर का सपना नजर आ रही है। कूटनीतिक गलियारों में इस समझौते को बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 60 दिनों का 'टेस्ट पीरियड' इस सदी का सबसे खतरनाक समय साबित हो सकता है। इस पूरी महाडील में इजराइल का कड़ा विरोध और किसी 'फॉल्स फ्लैग' (साजिशी हमले) का डर सबसे बड़ा 'एक्स-फैक्टर' बनकर उभरा है।
क्या है समझौते का अस्थाई फ्रेमवर्क?
पाकिस्तान सहित कई देशों की मध्यस्थता और कोशिशों के बाद तैयार किए गए इस अस्थाई समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
तत्काल युद्धविराम: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत और प्रभावी रूप से रोका जाएगा।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की बहाली: अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही के लिए इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को बिना किसी टोल या नाकाबंदी के खोला जाएगा। इसके बदले में अमेरिकी नौसेना भी अपनी घेराबंदी हटाएगी।
परमाणु वार्ता की समय-सीमा: अगले 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम, 'हाइली एनरिच्ड यूरेनियम' के निपटारे, अंतरराष्ट्रीय जांच (Inspections) और प्रतिबंधों में ढील जैसे जटिल मुद्दों पर अंतिम फैसला होना है।
चुनौती: इतने पेचीदा और दशकों पुराने विवादों को सुलझाने के लिए 60 दिन का समय बेहद कम है। इस दौरान किसी भी पक्ष की एक छोटी सी चूक पूरे समझौते को मलबे में तब्दील कर सकती है।
इजराइल का विरोध और ट्रंप की सख्त नाराजगी
इस शांति समझौते में इजराइल को शामिल नहीं किया गया है, जिसे वह अपने लिए एक 'कड़वी गोली' (Bitter Pill) मान रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका देश किसी भी ऐसे समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है जो उसकी सुरक्षा को खतरे में डालता हो।
इसी बीच, इजराइल द्वारा हाल ही में दक्षिणी बेरूत पर किए गए हमलों से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बेहद भड़क गए हैं। ट्रंप ने फोन पर नेतन्याहू को कड़ी फटकार लगाते हुए उन्हें ‘बेहद मुश्किल आदमी’ करार दिया। ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि वाशिंगटन अब इजराइल की हर मनमानी का आंख मूंदकर समर्थन नहीं करेगा और डील को नुकसान पहुंचाने पर इजराइल को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
साजिश की आशंका: राजनीतिक गलियारों में यह कयास तेज हैं कि इजराइली सरकार इस डील को पटरी से उतारने के लिए हिजबुल्लाह के खिलाफ कोई बड़ा गुप्त अभियान या 'फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन' (साजिशी हमला) कर सकती है।
अगले 60 दिनों के 5 सबसे बड़े खतरे
| खतरा | विवरण |
|---|---|
| 1. सीधा इजराइल-ईरान टकराव | यदि इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया या ईरान ने हिजबुल्लाह को पिछले दरवाजे से हथियार दिए, तो सीधी जंग शुरू हो जाएगी। |
| 2. लेबनान का बारूद | समझौते में शांति की बात है, लेकिन इजराइल हिजबुल्लाह को पूरी तरह निशस्त्र (Disarm) देखना चाहता है। यहाँ लगी चिंगारी बड़ी आग बन सकती है। |
| 3. ईरान के कट्टरपंथियों का दबाव | तेहरान में बैठे हार्डलाइनर्स इस डील को अमेरिका के सामने ‘घुटने टेकना’ बता रहे हैं। घरेलू दबाव में ईरान पैर पीछे खींच सकता है। |
| 4. परमाणु वार्ता की विफलता | 60 दिनों में यूरेनियम के खात्मे पर सहमति नहीं बनी, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई (Ultimate Alternative) की धमकी दे सकता है। |
| 5. क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठन | यमन के हूती और इराक-सीरिया के शिया लड़ाके अपनी स्वतंत्र कार्रवाइयों से इस शांति को कभी भी भंग कर सकते हैं। |
19 जून पर टिकी दुनिया की निगाहें
आगामी शुक्रवार, 19 जून को स्विट्जरलैंड में इस समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। यह कूटनीतिक प्रयास सराहनीय जरूर है, लेकिन असली परीक्षा हस्ताक्षर के बाद के 60 दिनों की होगी। यही दो महीने तय करेंगे कि दुनिया एक नए अमन के दौर में कदम रखेगी या मिडिल ईस्ट फिर से किसी विनाशकारी बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा।