मध्य प्रदेश: अपशिष्ट से आमदनी का अनूठा 'उज्जैन मॉडल': गंदे सीवरेज के पानी को बनाया कमाई का जरिया, नगर निगम को हर साल ₹16 लाख की आय

कचरा भी बना कंचन! सदावल एसटीपी में 8 वैज्ञानिक चरणों से शुद्ध हो रहा है नालों का पानी; किसानों को सिंचाई और मत्स्य पालन के लिए मिल रहा नया जीवन, जल संरक्षण की अनूठी मिसाल।

16 Jun 2026  |  112

 

 

उज्जैन।

धार्मिक नगरी उज्जैन ने स्वच्छता, पर्यावरण और जल संरक्षण की दिशा में देश के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की है। अमूमन लाइलाज समझी जाने वाली सीवरेज और गंदे पानी की समस्या को उज्जैन नगर निगम ने एक सफल बिजनेस मॉडल में तब्दील कर दिया है। शहर के बड़े नालों से बहकर आने वाले बदबूदार पानी को अब आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों से शुद्ध कर कृषि और मत्स्य पालन (मछली पालन) जैसे उपयोगी कार्यों में लगाया जा रहा है। इस अभिनव पहल से न केवल प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण हो रहा है, बल्कि नगर निगम को हर साल करीब 16 लाख रुपये का राजस्व (आय) भी प्राप्त हो रहा है।

सदावल प्लांट की बदली सूरत, जलकुंभी हटाकर शुरू हुआ काम

नगर निगम कमिश्नर अभिलाष मिश्रा ने 'लोकल 18' को इस सफलता की पूरी कहानी विस्तार से बताई। उन्होंने बताया कि सदावल स्थित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) परिसर और उससे जुड़े बड़े तालाबों में पहले जलकुंभी का साम्राज्य था, जिससे पूरा सिस्टम चोक पड़ा था। निगम ने मुस्तैदी दिखाते हुए सबसे पहले जलकुंभी को पूरी तरह साफ कराया और जल उपचार व्यवस्था को सुचारू किया। आज इसी मुस्तैदी का नतीजा है कि गंदा पानी लाखों रुपये की कमाई का जरिया बन चुका है।

जानिए कैसे होता है पानी 'स्वस्थ': 8 वैज्ञानिक चरण

कमिश्नर अभिलाष मिश्रा के मुताबिक, दूषित पानी को दोबारा जीवनदायी बनाने के लिए प्लांट में बेहद कड़े और वैज्ञानिक मापदंडों का पालन किया जाता है:

स्क्रीनिंग: सबसे पहले नालों से पंप हाउस के जरिए पानी को एसटीपी लाया जाता है, जहाँ स्क्रीनिंग प्रक्रिया के जरिए पानी में मौजूद प्लास्टिक, थर्माकोल और अन्य ठोस कचरे को अलग किया जाता है।

प्राइमरी ट्रीटमेंट: इसके बाद पानी में मौजूद भारी तत्व जैसे भारी रेत, कंकड़-पत्थर और गाद (Sludge) को हटाया जाता है।

बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट: इस चरण में सूक्ष्म जीवाणुओं (Microorganisms) की मदद से पानी में घुले हुए हानिकारक जैविक अपशिष्ट को खत्म किया जाता है।

क्लेरिफिकेशन और डिसइन्फेक्शन: अंत में क्लेरिफिकेशन और क्लोरीनेशन जैसी कीटाणुशोधन प्रक्रियाओं के जरिए पानी को पूरी तरह गंधहीन और शुद्ध किया जाता है।

सिंचाई, उद्योग और मछली पालन को मिला सहारा

इस 8-चरणीय वैज्ञानिक शोधन के बाद जो पानी बाहर निकलता है, वह पूरी तरह से सुरक्षित और उपयोगी होता है। इस पानी को अब स्थानीय किसानों को सिंचाई के लिए और मत्स्य पालन से जुड़े लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। पानी की शुद्धता का ही प्रमाण है कि इसमें मछलियां तेजी से पनप रही हैं, जिससे स्थानीय रोजगार को भी भारी बढ़ावा मिल रहा है। इसके साथ ही इस पानी का उपयोग औद्योगिक कार्यों में भी किया जा रहा है।

बहुआयामी फायदे: पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा

वॉटर रीसायक्लिंग का यह मॉडल केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय फायदे हैं:

नदियों का संरक्षण: गंदे नालों का पानी पवित्र नदियों और स्थानीय तालाबों में सीधे नहीं मिल पाता, जिससे नदी प्रदूषण पर लगाम लगी है।

भूजल स्तर में सुधार: कृषि के लिए ट्रीटेड पानी मिलने से किसानों की ट्यूबवेल और भूजल पर निर्भरता कम हुई है, जिससे वॉटर टेबल सुधर रहा है।

जनस्वास्थ्य: सीवर के खुले पानी से फैलने वाली बीमारियों पर रोक लगी है और स्वच्छ वातावरण तैयार हो रहा है।

उज्जैन नगर निगम का यह 'वेस्ट-टू-वेल्थ' मॉडल आज देश के अन्य नगरीय निकायों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है, जो यह सिखाता है कि इच्छाशक्ति हो तो कचरे और गंदे पानी से भी आत्मनिर्भरता की राह चुनी जा सकती है।

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