राजनीतिक विश्लेषण डेस्क।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलगती अंदरूनी कलह और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट के सामने मंडराते 'विखरने के डर' ने देश के सियासी गलियारों में एक बार फिर बड़े संगठनात्मक विभाजनों की सुगबुगाहट तेज कर दी है। आरोप-प्रत्यारोप की आक्रामक राजनीति और तीखे बयानों के बीच आज हर कोई पूछ रहा है—क्या टीएमसी और शिवसेना फिर किसी नए विभाजन की दहलीज पर खड़ी हैं?
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक बगावत, वैचारिक मतभेद और कुर्सी की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। पिछले पांच दशकों में कई ऐसे महा-विभाजन हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ स्थापित पार्टियों का वजूद बदल दिया, बल्कि देश की सत्ता के समीकरणों को भी हमेशा के लिए पलट दिया। आइए, भारतीय राजनीति के उन सबसे बड़े और नाटकीय 'राजनीतिक तलाकों' पर नजर डालते हैं जिनका फैसला आखिरकार चुनाव आयोग (EC) की चौखट पर हुआ।
1. साल 1969: जब दो धड़ों में बंट गई देश की सबसे बड़ी पार्टी 'कांग्रेस'
भारतीय राजनीति का सबसे पहला और ऐतिहासिक रूप से सबसे प्रभावशाली विभाजन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने व अनुभवी नेताओं के गुट (जिसे 'सिंडिकेट' कहा जाता था) के बीच हुआ था।
विवाद की वजह: राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद नए राष्ट्रपति पद का चुनाव।
क्या हुआ: इंदिरा गांधी ने निर्दलीय उम्मीदवार वीवी गिरी का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस संगठन ने नीलम संजीवा रेड्डी को मैदान में उतारा था। इस आर-पार की लड़ाई में कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई—कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) और कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट)। अंततः इंदिरा गांधी का गुट ही 'असली कांग्रेस' बनकर उभरा।
2. साल 1979: जनता पार्टी का बिखराव और बीजेपी का उदय
1975 के आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के विरोध में कई विपक्षी दलों ने मिलकर 1977 में 'जनता पार्टी' बनाई और सरकार बनाई। लेकिन नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और आरएसएस (RSS) की 'दोहरी सदस्यता' के मुद्दे पर 1979 में पार्टी में भीषण गृहयुद्ध छिड़ गया। मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई और इसी बिखराव की कोख से आगे चलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का जन्म हुआ।
3. 1980-1990 का दशक: एक 'जनता दल' और अनेक टुकड़े
जब केंद्र में एकतरफा दबदबा कम हुआ, तो क्षेत्रीय आकांक्षाएं जागीं। इसी दौर में जनता दल में कई बार टूट हुई, जिससे राज्यों की ताकतवर पार्टियां पैदा हुईं:
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) - बिहार
जनता दल यूनाइटेड (JDU) - बिहार
बीजू जनता दल (BJD) - ओडिशा
लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) - बिहार
4. साल 1999: 'विदेशी मूल' के मुद्दे पर कांग्रेस में टूट और NCP का गठन
सदी के अंत में कांग्रेस को तब बड़ा झटका लगा जब शरद पवार, पीए. संगमा और तारिक अनवर जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी के 'विदेशी मूल' का होने का मुद्दा उठाया। इन नेताओं को पार्टी से निकाला गया, जिसके बाद इन्होंने मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की नींव रखी।
हालिया इतिहास: जब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंचे 'पारिवारिक और राजनीतिक' दंगल
हाल के वर्षों में चुनाव आयोग के पास पार्टियों के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर बेहद पेचीदा मामले पहुंचे, जिन्होंने देश को चौंका दिया:
| वर्ष | पार्टी | मुख्य कारण / विवाद | चुनाव आयोग का फैसला |
|---|---|---|---|
| 2017 | AIADMK (तमिलनाडु) | जयललिता के निधन के बाद शशिकला-दिनाकरण बनाम ओ. पनीरसेल्वम-पलानीस्वामी में विरासत की जंग। | मशहूर 'दो पत्ती' चुनाव चिन्ह पहले फ्रीज हुआ, बाद में EPS-OPS गुट को मिला। |
| 2017 | समाजवादी पार्टी (UP) | चुनाव से ठीक पहले पिता मुलायम सिंह यादव और बेटे अखिलेश यादव के बीच संगठन पर नियंत्रण की लड़ाई। | अखिलेश यादव के गुट को 'असली सपा' माना गया और 'साइकिल' चिन्ह उन्हें सौंपा गया। |
| 2021 | LJP (बिहार) | रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान और चाचा पशुपति पारस में जंग। | मूल चिन्ह फ्रीज हुआ; चिराग को 'लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)' के रूप में नई पहचान मिली। |
| 2022-23 | शिवसेना (महाराष्ट्र) | एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे के खिलाफ तख्तापलट; अधिकांश विधायक-सांसद शिंदे के साथ गए। | बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को 'असली शिवसेना' मानकर 'तीर-कमान' सौंप दिया गया। |
| 2023-24 | NCP (महाराष्ट्र) | भतीजे अजीत पवार का अपने चाचा और संस्थापक शरद पवार के खिलाफ खुला विद्रोह। | अजीत पवार के धड़े को 'असली एनसीपी' की मान्यता मिली और 'घड़ी' चुनाव चिन्ह मिला। |
आखिर क्यों होता है पार्टियों का 'महा-विभाजन'?
प्रशासनिक और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत में पार्टियों के टूटने के पीछे 5 मुख्य बिंदु जिम्मेदार रहे हैं:
उत्तराधिकार और विरासत का विवाद: कद्दावर नेताओं के बाद पार्टी की कमान किसे मिले, यह सबसे बड़ा अखाड़ा बनता है।
केंद्रीय नेतृत्व की तानाशाही: दिल्ली या मुख्यालय में बैठे शीर्ष नेताओं द्वारा क्षेत्रीय नेताओं पर मनमाने फैसले थोपना।
गठबंधन की मजबूरी और विचारधारा से समझौता: सत्ता में आने के लिए जब पार्टियां धुर-विरोधी विचारधारा से हाथ मिलाती हैं, तो अंदरूनी असंतोष फूटता है (जैसा शिवसेना-NCP के मामले में दिखा)।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा: क्षेत्रीय नेताओं का बढ़ता कद और 'कुर्सी' की व्यक्तिगत चाहत।
TMC के सामने अब क्या है सबसे बड़ी चुनौती?
आंतरिक अनुशासन का संकट
चरण 1
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के सामने इस समय सबसे पहली चुनौती अपने बगावती तेवर अपना रहे नेताओं को शांत करने और आंतरिक अनुशासन को टूटने से बचाने की है।
दावेदारी की जंग
चरण 2
यदि यह आंतरिक कलह थमी नहीं और बगावती गुट ने खुद को 'असली टीएमसी' बताते हुए अलग राह चुनी, तो यह लड़ाई विधानसभा और संसद के आंकड़ों के खेल में तब्दील हो जाएगी।
चुनाव आयोग की चौखट
चरण 3
जैसा कि इतिहास गवाह है, ऐसे मामलों में आखिरी फैसला दिल्ली में निर्वाचन सदन (चुनाव आयोग) के दफ्तर में ही होता है, जहाँ 'बहुमत' और 'विधायकों-सांसदों के हस्ताक्षर' यह तय करते हैं कि पार्टी का सिंबल (जोगMultiplier घास-फूल) किसके पास रहेगा।
संपादकीय निष्कर्ष: भारत की आजादी के बाद का राजनीतिक सफर सिर्फ मजबूत पार्टियों के उभरने का ही नहीं, बल्कि उनके टूटने और नए गठबंधनों के बनने का जीवंत दस्तावेज रहा है। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के मौजूदा हालात यह साफ करते हैं कि भारतीय राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका फैसला जनभावनाओं से ज्यादा नेताओं के 'बल, बुद्धि और बगावत' के त्रिकोण से तय होता है।