ल्हासा/धर्मशाला।
तिब्बत के सांस्कृतिक और धार्मिक अस्तित्व को पूरी तरह मिटाकर उसे अपने रंग में रंगने की चीन की दमनकारी नीतियां अब और हिंसक हो चुकी हैं। तिब्बती स्वायत्त प्रांत 'हाइनान' से आ रही खबरों के मुताबिक, चीनी कम्युनिस्ट सरकार वहां तिब्बती धार्मिक प्रतीकों, सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं और स्थानीय तिब्बती अधिकारियों को बेरहमी से निशाना बना रही है। 'तिब्बत टाइम्स' की एक हालिया खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह सब तिब्बतियों की स्वतंत्र पहचान को खत्म कर उन्हें जबरन मुख्य भूमि चीन (सिनिसाइजेशन) में समाहित करने के एक बड़े और सुनियोजित अभियान का हिस्सा है।
नवनियुक्त चीनी अधिकारी के आते ही बढ़ा अत्याचार
रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत के चाबचा, त्रिका, मंगरा, बा और ड्राग्कार जैसे जिलों में अचानक दमन की कार्रवाई बहुत तेज हो गई है। स्थानीय लोगों में खौफ का माहौल है। इस बर्बर अभियान में आई तेजी की मुख्य वजह अप्रैल 2026 में चीनी अधिकारी शियान्ग युआनलाई की इस क्षेत्र में हुई नियुक्ति को माना जा रहा है। उनकी नियुक्ति के बाद से ही तिब्बती संस्कृति को कुचलने के आदेशों पर आक्रामक ढंग से काम शुरू कर दिया गया है।
90% पवित्र 'मणि पत्थर' नष्ट, घरों में घुसकर जलाए जा रहे प्रार्थना ध्वज
चीनी अधिकारियों ने तिब्बती बौद्ध धर्म की आस्था पर सीधा और गहरा प्रहार किया है। इस अभियान के तहत किए गए कुछ बेहद चिंताजनक कृत्य इस प्रकार हैं:
आस्था पर बुलडोजर: तिब्बती बौद्ध धर्म के बेहद महत्वपूर्ण और पवित्र प्रतीक माने जाने वाले सैकड़ों 'मणि पत्थरों' (Mani Stones) की संरचनाओं को चीनी अधिकारियों ने न केवल ध्वस्त कर दिया, बल्कि उन्हें मिट्टी में दफना दिया। दावा है कि क्षेत्र के 90% से अधिक मणि पत्थरों को नष्ट किया जा चुका है।
घरों में तानाशाही: यह कार्रवाई अब आम तिब्बती घरों तक पहुंच चुकी है। लोगों के घरों से पवित्र प्रार्थना ध्वज, पारंपरिक वायु-घोड़े के ध्वज (Lungta) और दरवाजों पर लगे पारंपरिक बैनरों को जबरन हटाकर आग के हवाले किया जा रहा है।
जबरन देशप्रेम का ढोंग: तिब्बतियों को अपने घरों की छतों पर अनिवार्य रूप से चीन का राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
चीनी अधिकारियों ने इस क्रूर अभियान को राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जातीय नीतियों को बढ़ावा देने और "धार्मिक परंपराओं से ऊपर चीनी राष्ट्र को रखने" के तर्क के साथ सही ठहराने की कोशिश की है।
तिब्बती अधिकारियों की सामूहिक बर्खास्तगी, चीनियों का कब्जा
सांस्कृतिक दमन के साथ-साथ अब तिब्बतियों को प्रशासनिक तौर पर भी पंगु बनाया जा रहा है। सरकारी विभागों से बड़े पैमाने पर तिब्बती मूल के अधिकारियों और कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त किया जा रहा है। चीनी प्रशासन का तर्क है कि "सार्वजनिक कार्यालयों में तिब्बतियों की संख्या बहुत अधिक है।" इन खाली पदों पर सुनियोजित तरीके से मुख्य भूमि चीन से लाए गए जातीय चीनी (हान चीनी) अधिकारियों की नियुक्तियां की जा रही हैं ताकि पूरे सिस्टम पर कम्युनिस्ट पार्टी का सीधा नियंत्रण स्थापित हो सके।
पिछली सदी के खौफनाक दौर की यादें हुईं ताजा
'तिब्बत टाइम्स' से बात करते हुए एक स्थानीय तिब्बती निवासी ने मौजूदा बदतर स्थिति की तुलना 1950 के दशक के अंत में हुए चीनी सेना के दमनकारी दौर से की। यह वही दौर था जब तिब्बतियों को अपनी ही धरती पर गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और मानवाधिकारों के घोर हनन का सामना करना पड़ा था। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चीन की इस हालिया कार्रवाई पर गहरी चिंता व्यक्त की है।