वियना/नई दिल्ली। भारत आगामी 21 वर्षों में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्तमान के लगभग 8 गीगावाट (GW) से बढ़ाकर 100 गीगावाट करने के एक महत्वाकांक्षी रोडमैप पर तेजी से काम कर रहा है। भारत के इस बड़े परमाणु अभियान के बीच ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना से देश के लिए एक बेहद राहत देने वाली और गौरवपूर्ण खबर आई है।
वैश्विक परमाणु निगरानी संस्था, 'अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी' (IAEA) ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि भारत का परमाणु सुरक्षा रिकॉर्ड पूरी तरह से बेदाग रहा है। एजेंसी के अनुसार, भारत के लगभग दो दर्जन परमाणु रिएक्टरों में आज तक एक भी परमाणु या विकिरण (रेडिएशन) से जुड़ी दुर्घटना दर्ज नहीं हुई है।
IAEA के इंसिडेंट एंड इमरजेंसी सेंटर के डायरेक्टर ने की पुष्टि
वियना में मामले की पुष्टि करते हुए IAEA के 'इंसिडेंट एंड इमरजेंसी सेंटर' (IEC) के डायरेक्टर अमजद शोक्र ने कहा कि वैश्विक रिकॉर्ड के मुताबिक भारत की तरफ से आज तक किसी भी परमाणु या विकिरण से जुड़ी अनहोनी की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई है।
उन्होंने कहा कि भारत के पास परमाणु प्रतिष्ठानों को सुरक्षित और कुशलतापूर्वक चलाने का एक लंबा इतिहास और समृद्ध अनुभव है। भारत के पास एक मजबूत कानूनी ढांचा, बेहद सक्षम रेगुलेटर (नियामक) और ऑपरेटर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप एजेंसी (IAEA) के साथ मिलकर लगातार काम कर रहे हैं।
वियना का 'साइलेंट वॉचटावर': चौबीसों घंटे रहती है पैनी नजर
वियना में स्थित IAEA का यह आपातकालीन केंद्र बिना किसी शोर-शराबे के बेहद बारीकी, सटीकता और गोपनीयता से काम करता है। इसे परमाणु सुरक्षा का 'साइलेंट वॉचटावर' भी कहा जाता है।
छोटा स्टाफ, बड़ा नेटवर्क: इस अत्याधुनिक कंट्रोल रूम में केवल 35 स्थायी कर्मचारी तैनात हैं, लेकिन इन्हें दुनिया भर के 170 से अधिक शीर्ष विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के एक बहुत बड़े नेटवर्क का सीधा समर्थन हासिल है।
रियल-टाइम कनेक्टिविटी: यह केंद्र भारत सहित दुनिया के 130 से अधिक देशों के आधिकारिक संपर्क केंद्रों से चौबीसों घंटे (24/7) डिजिटल रूप से जुड़ा रहता है, जो सीधे लाइव और रियल-टाइम जानकारी इस सिस्टम को भेजते हैं।
हादसे से पहले की तैयारी और आपातकालीन रिस्पॉन्स
डायरेक्टर अमजद शोक्र के मुताबिक, इस केंद्र का काम सिर्फ किसी हादसे के बाद शुरू नहीं होता, बल्कि वे सदस्य देशों को पहले से ही आपातकाल से निपटने के लिए प्रशिक्षित और तैयार करते हैं। वे देशों की तकनीकी क्षमताओं को इस तरह मजबूत करते हैं ताकि किसी भी संभावित आपात स्थिति में आम जनता और पर्यावरण को रेडिएशन के खतरों से सुरक्षित रखा जा सके। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परमाणु सुरक्षा की अंतिम और संप्रभु जिम्मेदारी हमेशा खुद उस देश की सरकार की होती है।
संकट के समय कैसे एक्शन में आता है यह केंद्र?
दुनिया में कहीं भी कोई परमाणु घटना या विसंगति होने पर वियना का यह केंद्र तुरंत एक्शन मोड में आ जाता है। इसकी कार्यप्रणाली को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
तत्काल सूचना संकलन: केंद्र तुरंत संबंधित देश के 24 घंटे चलने वाले संपर्क केंद्रों से संपर्क कर जमीनी जानकारी जुटाता है और उसकी तकनीकी बारीकी से जांच करता है।
रेडिएशन मैपिंग: इसके बाद टेक्निकल टीम मौसम और हवा के रुख को देखते हुए यह आकलन करती है कि उस घटना का रेडिएशन (विकिरण) का असर कहाँ तक और किस दिशा में फैल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मदद: अगर कोई देश संकट के समय मदद मांगता है, तो यह केंद्र तुरंत रेडिएशन से बचाव और तकनीकी सहायता के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की एक विशेष टीम को सीधे मौके पर रवाना करता है।
फुकुशिमा आपदा में निभाई थी बड़ी भूमिका: इस केंद्र की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011 में जापान की फुकुशिमा परमाणु आपदा के समय यह केंद्र बिना रुके लगातार 54 दिनों तक पूरी तरह एक्टिव और अलर्ट मोड पर रहा था। ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत के सुरक्षा रिकॉर्ड की सराहना होना, देश के वैज्ञानिक कौशल और परमाणु नीति की एक बड़ी वैश्विक जीत है।