अयोध्या:
भव्य राम मंदिर के चढ़ावे और दान राशि में हुए कथित घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, चौंकाने वाले और परेशान करने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। एसआईटी (SIT) की जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि दान राशि की गिनती के दौरान निर्धारित सुरक्षा और प्रशासनिक गाइडलाइंस की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। शुरुआती जांच के मुताबिक, गिनती प्रक्रिया के लिए तय कड़े नियमों में से महज 10 प्रतिशत नियमों का ही पालन किया गया था।
इस पूरे मामले में संबंधित बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका अब संदेह के घेरे में है। साक्ष्यों से पता चला है कि जिम्मेदार बैंक अधिकारी, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के रसूखदार पदाधिकारियों के आगे पूरी तरह नतमस्तक थे और उनकी आंखें मूंदे रहने के कारण ही इस हेरफेर को अंजाम दिया गया।
SIT जांच और नृपेंद्र मिश्रा के खुलासे: आउटसोर्सिंग का खेल
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बैंक प्रबंधन की लापरवाही पर कड़े सवाल उठाए थे। सूत्रों के अनुसार, बैंक ने नोटों की गिनती का काम एक निजी कंपनी को आउटसोर्स (ठेके पर) कर रखा था।
साठगांठ का आरोप: आरोप है कि ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने अपने सगे-संबंधियों और परिचितों को ही इस आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए भर्ती करवा दिया था। ट्रस्टियों के इसी प्रभाव और पहुंच के कारण बैंक अधिकारी हमेशा खामोश रहे।
सबूत जुटाने में 'CCTV बैकअप' बना बड़ी चुनौती
घोटाले की जड़ तक पहुंचने में एसआईटी को सबसे बड़ी दिक्कत तकनीकी मोर्चे पर आ रही है:
सिर्फ 45 दिन का बैकअप: मंदिर परिसर में लगे कैमरों का फुटेज बैकअप केवल 45 दिनों का ही है। नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज जानबूझकर डिलीट नहीं किए गए, बल्कि वे 'ऑटो-डिलीट' सिस्टम के तहत स्वतः मिट गए।
8 महीने के फुटेज गायब?: ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया है कि 8 महीने के पुराने फुटेज गायब हैं। चूंकि इतने पुराने फुटेज का बैकअप सिस्टम में नहीं है, इसलिए इसे साबित करना बेहद कठिन होगा। अब एसआईटी डिलीटेड डेटा को रिकवर करने के लिए फोरेंसिक जांच का सहारा ले रही है।
संदिग्धों का कबूलनामा: पकड़े गए पांच संदिग्ध कर्मचारियों ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वे लंबे समय से नोटों की गड्डियां गायब कर हेरफेर कर रहे थे।
आंकड़ों का गणित और विपक्ष के तीखे हमले
इस महाविवाद के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने सीधे सरकार और ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों पर निशाना साधा है।
दान का संदिग्ध गणित (मार्च 2025 - मार्च 2026) --------------------------------------------- कुल श्रद्धालु (अनुमानित) : 16 करोड़ कुल चढ़ावा (दर्ज) : ₹83 करोड़ औसत प्रति श्रद्धालु दान : मात्र ₹5
नोट: श्रद्धालुओं की भारी संख्या के मुकाबले चढ़ावे का यह आंकड़ा बेहद कम है, जिसने इस घोटाले के संदेह को और गहरा कर दिया है।
अखिलेश यादव का तंज: 'सोने का सोना, चांदी का चांदी हो'
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के अयोध्या दौरे पर कटाक्ष करते हुए नियमित ब्रीफिंग की मांग की। उन्होंने कहा, "जनता अब सिर्फ दूध का दूध और पानी का पानी नहीं चाहती, बल्कि 'सोने का सोना और चांदी का चांदी' चाहती है। चंदा चोरी की जांच कहां तक पहुंची, यह सार्वजनिक होना चाहिए।"
संजय सिंह का बड़ा आरोप: '9 करोड़ की जमीन 55 करोड़ में खरीदी'
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय पर सीधा हमला बोला।
जमीन घोटाला: संजय सिंह का आरोप है कि चंपत राय ने शाहनवाजपुर माझा में 117 बिस्वा जमीन को ₹55.47 करोड़ में खरीदा, जबकि उसकी वास्तविक सरकारी मालियत महज ₹9 करोड़ थी।
मांग: संजय सिंह ने कहा कि इस पूरे मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए और चंपत राय को तत्काल जेल भेजा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने नहीं चढ़ाया था नकद दान
इन विवादों के बीच कूटनीतिक और प्रशासनिक पक्ष साफ करते हुए नृपेंद्र मिश्रा ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान मुख्य यजमान के रूप में व्यक्तिगत तौर पर कोई नकद दान नहीं किया था, बल्कि उन्होंने परंपरा के अनुसार चांदी का छत्र और लाल वस्त्र अर्पित किए थे। मिश्रा ने माना कि ट्रस्ट में प्रशासनिक अनुभव की कमी है, इसलिए वहां एक अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए।
बड़ी बात: एसआईटी अब संदिग्ध पदाधिकारियों और बैंक कर्मियों के बयान दर्ज कर रही है। देश भर के करोड़ों सनातनियों की आस्था से जुड़े इस मंदिर में हुए इस कथित चंदा घोटाले ने देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है।