सोशल मीडिया पर धोखा! जिन चेहरों को देख आप खरीद रहे हैं सामान, वे इंसान ही नहीं... AI के 'नकली इन्फ्लुएंसर्स' का बड़ा खुलासा

सस्ते विज्ञापन के चक्कर में कंपनियों का बड़ा खेल; सच छिपाने के लिए क्रिएटर्स से साइन कराए जा रहे NDA, गायब हो रही पारदर्शिता!

22 Jun 2026  |  160

 

 

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए रील या पोस्ट में आप जिस खूबसूरत मॉडल या इन्फ्लुएंसर को देखकर कोई सामान खरीदने की सोच रहे हैं, संभल जाइए! मुमकिन है कि वह कोई इंसान ही न हो।

एक नई और चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, कई बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के प्रचार-प्रसार के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बने नकली इन्फ्लुएंसर्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं। ये एआई-जनित तस्वीरें और वीडियो तकनीकी रूप से इतने सटीक और असली लगते हैं कि आम ग्राहकों के लिए असली और नकली में भेद कर पाना नामुमकिन हो गया है। लोगों को लगता है कि कोई सच्चा उपभोक्ता अपना वास्तविक अनुभव साझा कर रहा है, जबकि पर्दे के पीछे सिर्फ कोडिंग का खेल होता है।

एग्रीमेंट का खेल: सच छिपाने की गहरी साजिश

कंपनियां इस खेल में पारदर्शिता को पूरी तरह खत्म करने के लिए एक शातिर तरीका अपना रही हैं। एआई कंटेंट बनाने वाले डिजाइनर्स और क्रिएटर्स से कंपनियां बकायदा नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) साइन करवा रही हैं।

कानूनी पाबंदी: इस एग्रीमेंट के तहत क्रिएटर्स कानूनी रूप से बंध जाते हैं। वे चाहकर भी दुनिया को यह नहीं बता सकते कि विज्ञापन में दिखने वाला चेहरा काल्पनिक है।

मुनाफे का गणित: कंपनियां ऐसा इसलिए कर रही हैं क्योंकि असली मॉडल्स को हायर करने, फोटोशूट और स्टूडियो के खर्च के मुकाबले एआई से विज्ञापन तैयार कराना बेहद सस्ता और आसान पड़ता है।

भ्रम का खतरा: पकड़ी जा रही हैं एआई की कमियां

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि विज्ञापनों में एआई के इस बढ़ते और भ्रामक इस्तेमाल से ब्रांड्स पर से ग्राहकों का भरोसा पूरी तरह उठ सकता है। वैश्विक स्तर पर इसके कुछ बड़े उदाहरण भी सामने आए हैं:

अमेरिका का 'वंस' (Once) ऐप: इस फोटो ऐप के विज्ञापन में कुछ दुल्हनें अपना अनुभव बताती दिखीं, लेकिन बारीकी से जांच करने पर पता चला कि वे चेहरे पूरी तरह एआई-जनित थे।

दुबई का फैशन ब्रांड 'एशले': इस मशहूर ब्रांड ने भी ऐसे विज्ञापन पोस्ट किए, जिनमें ध्यान से देखने पर एआई की तकनीकी कमियां (जैसे उंगलियों की अजीब बनावट या चेहरों का अस्वाभाविक दिखना) साफ पकड़ी गईं।

नियमों की स्थिति: भारत बनाम ब्रिटेन और पारदर्शिता की मांग

उपभोक्ता अधिकारों पर संकट: इस डिजिटल खतरे से निपटने के लिए अलग-अलग देशों में कानून भी अलग हैं। अगर भारत और ब्रिटेन की बात करें, तो दोनों ही देशों में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर सख्त गाइडलाइंस हैं, लेकिन एआई इन्फ्लुएंसर्स के इस नए दौर ने रेगुलेटरों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

अब विभिन्न उपभोक्ता संगठन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि कंपनियों के लिए विज्ञापनों में यह साफ तौर पर लिखना अनिवार्य किया जाए कि कंटेंट 'AI जनित' (AI-Generated) है। जब तक विज्ञापनों में पूरी पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक ग्राहकों के अधिकारों और उनके भरोसे की रक्षा करना मुमकिन नहीं होगा।

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