बचपन पर एल्गोरिदम का पहरा: 18 करोड़ भारतीय बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन; दुनिया लगा रही पाबंदियां, भारत में कितनी तैयारी?

नॉर्वे-ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया पर उम्र की बंदिशें, भारत में तीसरी कक्षा से ही सिखाया जा रहा AI; डेटा सुरक्षा के नियम तो बने, पर मानसिक विकास पर असर को लेकर नीति अब भी अधूरी।

22 Jun 2026  |  172

 

 

विशेष विश्लेषण ब्यूरो, नई दिल्ली

नई दिल्ली। क्या बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से दूर रखना चाहिए? यह सवाल इस समय दुनिया भर की सरकारों के लिए सबसे बड़ी नीतिगत चुनौती बन चुका है। जहाँ एक तरफ यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश बच्चों के मानसिक विकास और प्राइवेसी को बचाने के लिए स्क्रीन-टाइम और एल्गोरिदम पर कानूनी हथौड़ा चला रहे हैं, वहीं भारत की तस्वीर एकदम जुदा है। देश में 15 साल से कम उम्र के 18 करोड़ से अधिक नाबालिग नियमित रूप से स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं। ये बच्चे न केवल रील्स और वीडियो देख रहे हैं, बल्कि चैटजीपीटी (ChatGPT) और स्नैपचैट 'माय एआई' (Snapchat My AI) जैसे जनरेटिव एआई टूल्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं।

वैश्विक रुख: बच्चों को स्क्रीन से दूर करने की मुहिम

दुनिया के कई देश इस बात पर सहमत हैं कि बच्चों का बचपन तकनीकी कंपनियों के एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

नॉर्वे: सरकार ने सोशल मीडिया इस्तेमाल की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 16 साल करने का विधेयक पेश किया है। नॉर्वे सरकार का मानना है कि बच्चों को कम उम्र में एआई देने के बजाय पहले पढ़ना, लिखना और गणित जैसी बुनियादी क्षमताएं सीखनी चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया: 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया और एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म्स पर पूर्ण और सख्त प्रतिबंध लागू कर दिया गया है।

यूरोपीय संघ (EU): डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) के तहत कंपनियों पर बच्चों के डेटा की प्रोफाइलिंग करने और उन्हें टारगेटेड विज्ञापन दिखाने पर रोक लगा दी है। उम्र के वेरिफिकेशन के लिए एक विशेष सरकारी ऐप भी जारी किया गया है।

फ्रांस और डेनमार्क: स्कूलों को पूरी तरह से 'मोबाइल-फ्री जोन' बनाने की दिशा में कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

भारत की स्थिति: तीसरी कक्षा से ही एआई का ककहरा

वैश्विक प्रतिबंधों के विपरीत, भारत सरकार युवाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के लिए कम उम्र से ही एआई शिक्षा पर जोर दे रही है। 'अटल इनोवेशन मिशन' और 'इंडियाएआई मिशन' के तहत युवाओं के लिए ग्लोबल चैलेंज आयोजित किए जा रहे हैं। वहीं शिक्षा मंत्रालय ने ‘AI फॉर स्कूल्स’ पहल के तहत सीबीएसई (CBSE) के 18,000 से अधिक स्कूलों में कक्षा 3 से ही एआई आधारित पाठ्यक्रम को शामिल कर लिया है।

हालाँकि, भारत में बच्चों के लिए एआई टूल्स का उपयोग करने की कोई स्पष्ट कानूनी उम्र सीमा तय नहीं है। ज्यादातर एआई प्लेटफॉर्म अपनी वैश्विक शर्तों के आधार पर काम करते हैं, जहां उम्र का सत्यापन महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

देश का डिजिटल प्रोफाइल: आंकड़ों की जुबानी

स्मार्टफोन क्रांति: भारत में 1.06 अरब से अधिक सक्रिय मोबाइल कनेक्शन और लगभग 96 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं।

डेटा की बाढ़: एक भारतीय स्मार्टफोन यूजर औसतन हर महीने 37GB डेटा खर्च करता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है।

युवाओं का दबदबा: स्मार्टफोन यूजर्स में 53% हिस्सेदारी 18 से 24 वर्ष के युवाओं की है। ग्रामीण इलाकों में 95.5% और शहरी इलाकों में 97.6% युवाओं के पास स्मार्टफोन मौजूद है।

एआई का बढ़ता दायरा: देश में 10 करोड़ से ज्यादा एक्टिव एआई यूजर्स हैं, जिनमें से 57% यूजर 15 से 24 वर्ष की आयु के हैं। 'माइकल पेज टैलेंट ट्रेंड्स 2026' की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 73% प्रोफेशनल्स अपने कामकाज में जनरेटिव एआई का उपयोग कर रहे हैं।

सिल्वर लाइनिंग: क्या कहता है भारत का कानून?

भारत सरकार ने 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन' (DPDP) नियमों के जरिए बच्चों की डिजिटल सुरक्षा का एक बुनियादी ढांचा तैयार किया है। इन नियमों के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले कंपनियों को माता-पिता की सत्यापित सहमति (डिजिलॉकर, सरकारी पहचान पत्र या वीडियो वेरिफिकेशन के जरिए) लेनी होगी। इसके अलावा, बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की ट्रैकिंग और विज्ञापन दिखाने पर सख्त पाबंदी है।

सबसे बड़ी चुनौती: प्राइवेसी से आगे 'मानसिक विकास' का क्या?

कृषि, तकनीक और बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के मौजूदा नियम केवल 'डेटा सुरक्षा' और 'गोपनीयता' तक ही सीमित हैं। सबसे बड़ी चिंताएं निम्नलिखित हैं:

सोचने की क्षमता पर असर: लगातार होमवर्क या समस्याओं के समाधान के लिए चैटजीपीटी जैसे एआई टूल्स पर निर्भर रहने से बच्चों की खुद सोचने और समस्या सुलझाने की क्रिटिकल थिंकिंग (Critical Thinking) प्रभावित हो रही है।

सुरक्षा का संकट: डीपफेक, साइबर बुलिंग और इंटरनेट पर मौजूद भ्रामक जानकारियों तक बच्चों की पहुंच बहुत आसान हो चुकी है।

कमजोर एज-वेरिफिकेशन: भारत के लिए टेक कंपनियों के पास कोई ठोस उम्र सत्यापन प्रणाली नहीं है; कोई भी बच्चा गलत जन्मतिथि डालकर नियमों को बाईपास कर सकता है।

अभिभावकों में जागरूकता की कमी: भारत में बड़ी संख्या में माता-पिता खुद पहली पीढ़ी के इंटरनेट यूजर हैं, जो इंटरनेट तो चला लेते हैं लेकिन एआई और एल्गोरिदम के छिपे हुए मानसिक खतरों से पूरी तरह अनजान हैं।

निष्कर्ष: फिलहाल भारत डिजिटल विकास और तकनीकी साक्षरता के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन दुनिया के अन्य देशों से सबक लेते हुए जल्द ही बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर एक 'समर्पित चाइल्ड एआई पॉलिसी' (Child AI Policy) बनाने की सख्त आवश्यकता है।

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