जल संकट के बीच अन्नदाता को राहत: पूसा बासमती देगी बंपर पैदावार, सूखे में भी दोगुना उत्पादन देने की क्षमता

जलवायु परिवर्तन और गिरते भूजल स्तर के बीच IARI पूसा का बड़ा आविष्कार; भारत की पहली सूखा सहनशील बासमती किस्म, कम पानी में देगी रिकॉर्ड तोड़ उपज।

29 Jun 2026  |  129

 

 

नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में मानसून की कछुआ चाल ने खरीफ फसलों की खेती करने वाले किसानों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में तेजी से गिरते भूजल स्तर और पानी की किल्लत ने बासमती धान के उत्पादन पर संकट खड़ा कर दिया है। जल संकट के इस दौर में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) पूसा द्वारा विकसित 'पूसा बासमती 1882' किसानों के लिए एक वरदान और नई उम्मीद बनकर उभरी है। यह भारत की पहली सूखा सहनशील (Drought Tolerant) बासमती धान की किस्म है, जो कम पानी में भी बंपर पैदावार देने की अनूठी क्षमता रखती है।

सूखा क्षेत्रों के लिए वरदान: इन राज्यों के लिए मिली अधिसूचना

साल 2022 में केंद्रीय कृषि विमोचन समिति द्वारा अधिसूचित की जा चुकी पूसा बासमती 1882 को विशेष रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के बासमती उत्पादक क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बासमती उत्पादक इलाकों में इसकी खेती करने की सिफारिश की है। इन क्षेत्रों में यदि पानी की कमी या सूखे जैसे हालात बनते हैं, तब भी यह किस्म फसल को बर्बाद होने से बचाती है।

'जादुई जीन' का कमाल: सिर्फ 135 दिनों में पककर तैयार

यह लोकप्रिय किस्म 'पूसा बासमती-1' का ही एक बेहद उन्नत रूप है। वैज्ञानिकों ने इसमें क्यूडीटीवाई 1.1 (qDTY 1.1) नामक एक विशेष क्यूटीएल जीन शामिल किया है, जो पौधों को सूखे की स्थिति में भी अंदरूनी मजबूती देता है।

इस किस्म की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:

समय की बचत: यह खरीफ सीजन की फसल है जो मात्र 135 दिनों में पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है। इससे किसान अगली फसल की बुवाई भी समय पर कर सकते हैं।

शानदार औसत उपज: इसकी औसत पैदावार 46.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

अनुकूल परिस्थितियों में रिकॉर्ड: यदि मौसम और सिंचाई अनुकूल रहे, तो यह 59.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का बंपर उत्पादन दे सकती है।

रिसर्च के आंकड़े: सूखे में पुरानी वैरायटी से दोगुना बेहतर प्रदर्शन

'रेन आउट शेल्टर' में वैज्ञानिकों द्वारा किए गए कड़े परीक्षणों में इस नई वैरायटी के चौंकाने वाले और बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं:

सूखे की स्थिति में: जहाँ पानी की भारी किल्लत के बीच पुरानी 'पूसा बासमती-1' की उपज केवल 496 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई, वहीं नई 'पूसा बासमती 1882' ने 987.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का उत्पादन दिया। यानी सूखे के दौरान इसने लगभग दो गुना अधिक उपज देने की क्षमता दिखाई।

सामान्य सिंचाई में: यदि पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो, तब भी यह नई किस्म पुरानी पूसा बासमती-1 की तुलना में 10.26 प्रतिशत अधिक पैदावार देती है।

संपादकीय टिप्पणी: बदलते मौसम में कृषि की नई ढाल पूसा बासमती 1882 में मौजूद विशेष जीन उस वक्त सबसे ज्यादा सक्रिय होता है जब फसल में बालियां बनने लगती हैं। यह वह नाजुक समय होता है जब धान को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। कम पानी में भी अपनी उत्पादकता बनाए रखने की इस बेजोड़ खूबी के कारण, यह वैरायटी जल संकट से जूझ रहे किसानों की आय सुरक्षित रखने और भारतीय बासमती के वैश्विक बाजार को मजबूत बनाए रखने में मील का पत्थर साबित होगी।

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