न्याय की बुनियाद पर 'एआई हैलुसिनेशन' का प्रहार; सुप्रीम कोर्ट ने चेताया—'अदृश्य और खतरनाक है एआई का अंधाधुंध उपयोग'

क़ानूनी फैसलों में एआई-जनरेटेड नकली नज़ीरों के इस्तेमाल पर शीर्ष अदालत सख्त, एनसीएलटी (NCLT) का फैसला किया रद्द; कहा- 'न्यायिक प्रक्रिया में इंसानी नियंत्रण सर्वोपरि'‌

02 Jul 2026  |  155

 

 

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती पैठ और इसके अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं में एआई के अंधाधुंध उपयोग को 'अदृश्य और खतरनाक' बताते हुए इसकी तुलना 'मिथाइल आइसोसाइनेट' जैसी ज़हरीली गैस के रिसाव से कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि एआई द्वारा तैयार मनगढ़ंत और नकली उदाहरणों पर भरोसा करना न्याय की पूरी बुनियाद को ही ध्वस्त कर देता है।

यह तल्ख़ टिप्पणी जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के एक फैसले को रद्द करते हुए की, जिसमें ट्रिब्यूनल ने अनजाने में एआई द्वारा तैयार किए गए ऐसे कानूनी उदाहरणों (Precedents) और फैसलों पर भरोसा कर लिया था, जो असल में वजूद में ही नहीं थे।

गैस रिसाव जैसा विनाशकारी है 'एआई का भ्रम'

अदालत ने अपने फैसले में एआई टूल्स द्वारा गलत और मनगढ़ंत जानकारी देने की प्रवृत्ति (AI Hallucination) पर चिंता जताते हुए कहा:

"एआई द्वारा नकली, गैर-मौजूद और काल्पनिक जानकारी बनाना और उसे कानून में नज़ीर के तौर पर इस्तेमाल करना न्याय के दायरे में 'मिथाइल आइसोसाइनेट' गैस के रिसाव जैसा है। यह अदृश्य, खतरनाक और विनाशकारी है। जब तक इस पर किसी का ध्यान जाता है, तब तक यह न केवल सब कुछ दूषित कर चुका होता है, बल्कि न्यायिक फैसले की बुनियाद को ही खत्म कर देता है।"

अदालत ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि न्यायाधीशों और कानूनी पेशेवरों को बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत है, क्योंकि बिना नियम-कानून के एआई का इस्तेमाल धीरे-धीरे पूरी न्याय व्यवस्था में घुसपैठ कर जाएगा।

फैसले में 'इंसानी दिमाग' ही रहेगा अंतिम बॉस

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रगति और अदालतों में इसके समावेश का वे स्वागत करते हैं, लेकिन एआई कभी भी इंसानी सोच और विवेक का विकल्प नहीं हो सकता। पीठ ने कहा, "यह असाधारण क्षमता पेशेवरों को तेज़ी से काम करने के लिए प्रेरित कर रही है। यहाँ तक कि यूके में 'गारफील्ड लॉ लिमिटेड' जैसी पूरी तरह एआई-आधारित लॉ फर्म को भी मंज़ूरी मिली है। लेकिन, एआई को केवल एक 'मददगार' के तौर पर अपनाया जा सकता है। फैसला लेने की प्रक्रिया के हर चरण पर अंतिम और पूरी जिम्मेदारी सिर्फ इंसान के ही हाथ में रहनी चाहिए।"

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के दिवालियापन (Insolvency) मामले से जुड़ा है। जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड द्वारा दिए गए ऋण और कॉर्पोरेट गारंटी को लेकर एनसीएलटी (NCLT) की मुंबई बेंच ने 28 अगस्त, 2024 को दिवालियापन प्रक्रिया को मंजूरी दी थी, जिसे बाद में एनसीएलएटी (NCLAT) ने भी बरकरार रखा।

सस्पेंड की गई डायरेक्टर पूजा रमेश सिंह ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले के समर्थन में कुछ ऐसे काल्पनिक और नकली अदालती उदाहरणों (Precedents) का सहारा लिया, जो केवल कल्पना पर आधारित थे और एआई टूल्स द्वारा मनगढ़ंत तरीके से तैयार किए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा एक्शन, बार काउंसिल को निर्देश

इस गंभीर चूक को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित कड़े कदम उठाए हैं:

फैसले रद्द: कोर्ट ने NCLT और NCLAT दोनों के आदेशों को पूरी तरह रद्द कर दिया है और ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वे केवल वास्तविक तथ्यों के आधार पर नए सिरे से फैसला करें।

जांच समिति का गठन: शीर्ष अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को तत्काल एक विशेष कमेटी बनाने और कानूनी पेशेवरों द्वारा एआई के ऐसे दुरुपयोग के मामले की विस्तार से जांच करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने अंत में यह भी साफ किया कि वे 'हैलुसिनेशन' के तकनीकी कारणों को ठीक करने पर बात नहीं कर रहे हैं—वह वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का काम है—लेकिन न्याय की शुचिता बनाए रखने के लिए कानूनी बिरादरी को एआई के इस मायाजाल से दूरी और सावधानी बरतनी ही होगी।

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