ढाका/कॉक्स बाजार। पूर्वी बांग्लादेश में जारी मूसलाधार मानसूनी बारिश अब तबाही का सबब बन चुकी है। कॉक्स बाजार जिले में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों पर रविवार देर रात और सोमवार सुबह प्रकृति का भीषण प्रकोप टूटा। लगातार हो रही भारी बारिश के कारण कई जगहों पर पहाड़ियाँ ढह गईं (भूस्खलन), जिसकी चपेट में आने से पांच बच्चों सहित कम से कम आठ रोहिंग्या शरणार्थियों की दर्दनाक मौत हो गई।
सोते समय मलबे में दफन जिंदगी
फायर सर्विस और सिविल डिफेंस के अधिकारी डॉलर त्रिपुरा ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि पहाड़ी ढलानों पर तेज पानी के बहाव के कारण मिट्टी ढीली हो गई थी, जिससे शरणार्थियों के कच्चे घर ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
आधी रात को आपदा: भूस्खलन ने कैंपों में कम से कम चार अलग-अलग जगहों पर कहर बरपाया। जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, तभी अचानक टनों मिट्टी और मलबा उनके आशियानों पर आ गिरा।
बचाव कार्य: सूचना मिलते ही बचाव दल मौके पर पहुंचे। राहत कर्मियों ने कड़ी मशक्कत के बाद मलबे से सात शव बरामद किए, जबकि आठवां शव स्थानीय शरणार्थियों को मिला।
मासूम घायल: मलबे से दो बच्चों को गंभीर रूप से घायल हालत में सुरक्षित बाहर निकाला गया है, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
शव सुपुर्द: कानूनी प्रक्रिया और पहचान के बाद सभी शवों को स्थानीय शरणार्थी नेताओं और पुलिस के माध्यम से पीड़ित परिवारों को सौंप दिया गया है।
युद्ध स्तर पर रेस्क्यू; 1000 लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए
प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि भारी बारिश का सिलसिला अब भी थमा नहीं है। पहाड़ी इलाकों में बने कैंपों पर खतरा लगातार मंडरा रहा है। ऐहतियात के तौर पर प्रशासन अब तक लगभग 1,000 रोहिंग्या शरणार्थियों को बेहद खतरनाक पहाड़ी ढलानों से हटाकर सुरक्षित कैंपों और आश्रय स्थलों में पहुंचा चुका है।
और बढ़ेगी आफत: राजधानी ढाका में मौसम विभाग ने चेतावनी जारी करते हुए बताया है कि आने वाले दिनों में बारिश की तीव्रता और बढ़ सकती है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा और अधिक गहरा गया है।
शरणार्थी कैंपों में लगातार मंडराता मौत का साया
UNHCR की चिंताजनक रिपोर्ट:
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) के आंकड़ों के मुताबिक, रोहिंग्या कैंपों के लिए मानसून हमेशा से काल बनकर आता है। वर्ष 2021 से 2026 के बीच इन शरणार्थी शिविरों में हुए भूस्खलन की घटनाओं में अब तक 36 शरणार्थियों की जान जा चुकी है और कम से कम 86 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
वर्तमान में पड़ोसी देश म्यांमार में सैन्य हिंसा और उत्पीड़न से जान बचाकर भागे 10 लाख से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के इन बेहद भीड़भाड़ वाले और अस्थायी कैंपों में रहने को मजबूर हैं, जहाँ हर साल मानसून उनके अस्तित्व के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर देता है।