झारखंड में 'दोहरी राजनीति' के चक्रव्यूह में कांग्रेस! सत्ता का सुख भी और सरकार पर वार भी; योगेंद्र साव की वापसी ने सुलगाई बहस

हेमंत सरकार में शामिल होकर भी अपनों की ही घेराबंदी; बड़कागांव में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने पुलिसिया कार्रवाई को बताया अनुचित, विपक्ष ने साधा निशाना।

08 Jul 2026  |  889

 

रांची। झारखंड की सियासत में इन दिनों सत्ताधारी दल कांग्रेस का रुख एक बार फिर बड़े विवाद और चर्चा के केंद्र में आ गया है। एक तरफ पार्टी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में मलाईदार पदों और सत्ता का पूरा आनंद ले रही है, तो दूसरी तरफ कई मौकों पर अपनी ही सरकार और प्रशासनिक कार्यशैली को सरेआम कटघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आ रही है। इस विरोधाभासी रवैये के कारण विपक्ष को बैठे-बिठाए कांग्रेस पर 'दोहरी राजनीति' करने का आरोप लगाने का मौका मिल गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का भी स्पष्ट मानना है कि सत्ता की मलाई खाते हुए सरकार की सार्वजनिक मंचों से आलोचना करना जनता के बीच एक भारी भ्रम और अविश्वास की स्थिति पैदा करता है।

योगेंद्र साव की 'घर वापसी' से गर्माई सूबे की सियासत

इस सियासी खींचतान को हवा तब मिली जब कांग्रेस ने बड़कागांव के पूर्व विधायक योगेंद्र साव का सात वर्षों का निलंबन वापस लेते हुए उन्हें फिर से पार्टी में पूरी तरह सक्रिय कर दिया। गौरतलब है कि योगेंद्र साव को उस वक्त पार्टी से सस्पेंड किया गया था, जब उन्होंने अपने बड़कागांव स्थित आवास पर प्रशासनिक कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया था। यही नहीं, उनकी बेटी और पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने भी बाकायदा प्रेस वार्ता कर सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

अब, राज्यसभा चुनाव के ठीक बाद योगेंद्र साव की इस ससम्मान वापसी को लेकर राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार बेहद गर्म है।

एसआईआर कार्यक्रम में अपनी ही पुलिस पर बरसे वित्त मंत्री

इस विवाद की सबसे ताजा कड़ी बड़कागांव में आयोजित कांग्रेस के एसआईआर (SIR) कार्यक्रम के दौरान देखने को मिली। मंच पर कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, योगेंद्र साव और अंबा प्रसाद जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अपनी ही सरकार के पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लिया।

वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कड़े शब्दों में कहा: "कांग्रेस नेताओं के घरों पर भारी पुलिस बल के साथ जिस तरह की कार्रवाई की गई, वह किसी भी कोण से उचित नहीं थी। लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होनी चाहिए।"

रणनीति या आंतरिक कलह? पक्ष-विपक्ष के अपने दावे

इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य सवाल यह है कि सरकार में मुख्य साझेदार रहते हुए भी कांग्रेस की यह सार्वजनिक आलोचना उसकी कोई सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है या पार्टी के भीतर चल रही गहरी आंतरिक असहमति का नतीजा?

कांग्रेस का पक्ष: पार्टी के शीर्ष नेताओं का कहना है कि वे सरकार में भले ही शामिल हैं, लेकिन जनहित के मुद्दों और अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी बात रखने से कभी पीछे नहीं हटेंगे।

विपक्ष का हमला: विपक्षी दलों ने इसे कांग्रेस की अंतर्निहित विरोधाभासी और ढोंगी राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है, जहां वह जिम्मेदारी से भागते हुए केवल अपनी साख बचाना चाहती है।

अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी ही सरकार के वित्त मंत्री और सहयोगी दल के इस तीखे तेवर पर क्या रुख अपनाते हैं।

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