अवैध व असुरक्षित इमारतों पर सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा: दिल्ली, पटना, लखनऊ समेत कई शहरों के अधिकारियों से मांगी रिपोर्ट

"लापरवाही हुई तो सीधे कमिश्नर और CEO होंगे जिम्मेदार"; 4 अगस्त को अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश।

09 Jul 2026  |  1104

 

 

नई दिल्ली। देश भर में गैर-कानूनी और असुरक्षित ढांचों के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ा और सख्त रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, गुरुग्राम, लखनऊ, पटना और तमिलनाडु के नगर निगम अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने आपदाओं को न्योता दे रहीं खतरनाक और अवैध इमारतों को गिराने या सील करने के संबंध में की गई कार्रवाई की 'स्टेटस रिपोर्ट' तलब की है।

हाल ही में दिल्ली के साकेत में इमारत गिरने और मालवीय नगर व लखनऊ के अलीगंज में हुई भीषण आगजनी जैसी त्रासदियों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह सख्त आदेश जारी किया। कोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों को आगाह किया है कि वे अगली सुनवाई यानी 4 अगस्त को अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर रहें।

जमीनी सर्वे के लिए IIT दिल्ली के विशेषज्ञों की टीम गठित

दिल्ली के विभिन्न इलाकों में अवैध और असुरक्षित इमारतों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई-लेवल विशेष टीम गठित करने का निर्देश दिया है।

टीम का ढांचा: इस विशेष जांच दल में IIT दिल्ली के दो सीनियर प्रोफेसर, दो ड्राफ्ट्समैन और दिल्ली नगर निगम (MCD) के अधिकारी शामिल होंगे।

लक्षित क्षेत्र: यह टीम साकेत, मालवीय नगर और लाजपत नगर का तय समय-सीमा के भीतर गहन सर्वे करेगी। इसी तरह का एक सर्वे नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सरोजिनी नगर में भी किया जाएगा।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी: कोर्ट ने दोटूक शब्दों में कहा, "समिति द्वारा ईमानदार रिपोर्ट देने में रत्ती भर भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए। अगर हमें जरा भी संदेह हुआ, तो रिपोर्ट की सत्यता जांचने के लिए हम इस कोर्ट से एक विशेष टीम भेज सकते हैं।"

कोर्ट की चेतावनी: "निर्देश न माने, तो सीधे अवमानना की कार्रवाई होगी"

सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के शीर्ष नेतृत्व को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि अगली सुनवाई तक की गई कार्रवाई का ब्योरा रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया, तो कोर्ट कड़े कदम उठाएगा:

"अदालत सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारियों — यानी संबंधित नगर पालिकाओं या विकास प्राधिकरणों के कमिश्नर या CEO — के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही शुरू कर सकती है। अगर आदेशों के बावजूद जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं पाई गई, तो सीधे तौर पर उस अथॉरिटी के मुख्य कार्यकारी प्रमुख (CEO) की जिम्मेदारी तय की जाएगी।"

"सिर्फ बिल्डरों की गिरफ्तारी क्यों, दोषी सरकारी अफसरों पर एक्शन कब?"

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र (Amicus Curiae) की उस दलील से पूर्ण असहमति और चिंता जताई, जिसमें कहा गया कि प्रशासनिक इकाइयाँ केवल अपनी साख बचाने के लिए काम करती हैं। कोई भी हादसा (इमारत गिरना या आग लगना) होने के बाद सिर्फ बिल्डरों को गिरफ्तार कर पल्ला झाड़ लिया जाता है, लेकिन उन भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी अधिकारियों पर कोई गाज नहीं गिरती जो इन अवैध निर्माणों को शह देते हैं।

अदालत ने तल्ख लहजे में सभी अथॉरिटीज को निर्देश दिया कि वे अपनी रिपोर्ट में उन सीनियर अधिकारियों के नाम भी उजागर करें, जो अवैध निर्माणों को रोकने में नाकाम रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले 20 मई को दिए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से चिन्हित अवैध ढांचों को तुरंत सील करने और ढहाने के आदेश दिए थे। साथ ही विभागों के प्रमुखों को व्यक्तिगत रूप से शपथ-पत्र (Affidavit) देकर यह बताने को कहा था कि धरातल पर वाकई क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट के इस रुख से अब अवैध निर्माण कराने वाले बिल्डरों और उन्हें संरक्षण देने वाले अफसरों में हड़कंप मच गया है।

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