नई दिल्ली / वाशिंगटन / तेहरान। पश्चिम एशिया (Middle East) में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर सबसे बड़ा झटका लगा है। शांति समझौते पर एमओयू (MoU) साइन होने के बाद भी अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का एक नया और कहीं अधिक खतरनाक दौर शुरू हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर यह एलान कर दिया है कि 'सीजफायर (युद्धविराम) खत्म हो चुका है।'
वैश्विक भू-राजनीतिक विश्लेषकों (Geopolitical Experts) का मानना है कि यह बढ़ता तनाव साफ संकेत दे रहा है कि दोनों देशों के बीच का यह गतिरोध अब किसी अस्थायी शांति में नहीं बदलेगा, बल्कि यह दुनिया को एक 'विनाशकारी परमाणु युद्ध' के मुहाने पर लाकर खड़ा कर सकता है।
ट्रंप का 'एक हफ्ते का प्लान' फेल, लंबी जंग में फंसा अमेरिका
जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट कमर आगा ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताते हुए एक विशेष विश्लेषण साझा किया है। मध्य पूर्व की राजनीति और ईरान के शासन को बारीकी से समझने वाले कमर आगा के मुताबिक:
"अमेरिका इस युद्ध में अपने एक भी मकसद को पूरा नहीं कर पाया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने महज एक हफ्ते के भीतर ईरान को जीतकर वहां सत्ता परिवर्तन (Regime Change) का प्लान बनाया था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका। ईरान पूरी तरह अड़ गया है। अब स्थिति यह है कि यदि अमेरिका यहां से पीछे हटता है, तो ईरान खुद को एक महाशक्ति के रूप में पेश करेगा जिसने अमेरिका और इजरायल को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।"
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को उसकी मर्जी के खिलाफ ईरान के साथ एक ऐसे अंतहीन युद्ध में घसीट लिया गया है, जहां वियतनाम और अफगानिस्तान युद्ध का भूत उसे दोबारा डरा रहा है।
दोनों देशों की ताकतों में बड़ा अंतर: सैन्य क्षमता बनाम राजनीतिक संकल्प
इस युद्धविराम के विफल होने की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों की शक्तियों का अलग-अलग स्वरूप होना है:
| देश | मुख्य ताकत | कमजोरी / सीमाएं |
|---|---|---|
| अमेरिका | प्रचंड सैन्य क्षमता: दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीक और घातक हथियारों का भंडार। | कमजोर राजनीतिक संकल्प: अमेरिका इस युद्ध में फंसे नहीं रहना चाहता। वह ईरान में अपनी जमीनी सेना (Ground Troops) भेजने और अपने हथियारों के भंडार को खत्म करने से डर रहा है। |
| ईरान | चट्टानी राजनीतिक संकल्प: वैचारिक रूप से प्रेरित और हर हाल में टिके रहने के लिए बेहद सख्त और बेरहम सरकार। | जर्जर अर्थव्यवस्था: लंबे युद्ध और कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान को भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है। |
पीछे हटना 'असंभव' क्यों? समझिए अंदरूनी समीकरण
अमेरिका, इजरायल और ईरान तीनों ही देशों के घरेलू राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि कोई भी पक्ष समझौते की टेबल पर झुकने को तैयार नहीं है:
ईरान (IRGC का शिकंजा): युद्ध के कारण ईरान की सत्ता पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का नियंत्रण बेहद सख्त हो चुका है। यदि कोई ईरानी नेता बातचीत की मेज पर जरा भी झुकता है, तो IRGC उसे 'गद्दार' घोषित कर सकता है। प्रतिबंधों में ढील और 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड के लालच के बाद भी ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है।
इजरायल (कट्टरपंथियों का डर): इतिहास गवाह है कि कट्टर दुश्मन से समझौता करने पर 1981 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और 1995 में इजरायल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या कर दी गई थी। बेंजामिन नेतन्याहू इस बात को बखूबी जानते हैं कि समझौते की कीमत जान देकर चुकानी पड़ सकती है।
अमेरिका (ट्रंप की घरेलू मजबूरी): डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीद थी कि आर्थिक मदद के बदले ईरान अपनी जिद छोड़ देगा, लेकिन उन्होंने तेहरान के इरादों को कम करके आंका। अब ईरान से किसी भी समझौते पर उनके अपने कट्टर 'MAGA' (Make America Great Again) समर्थक ही उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं।
परमाणु युद्ध की आशंका कितनी सच?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल का डेढ़ वर्ष बीत चुका है और ईरान के पास उन्हें अगले ढाई वर्षों तक इस युद्ध में उलझाए रखने की पूरी क्षमता है। तेहरान के डिप्टी मेयर हामिदरेज़ा गुलामज़ादेह का एक बयान दुनिया को डराने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास अब पारंपरिक (Conventional) लड़ाई का विकल्प खत्म हो चुका है और उसके पास अब केवल 'परमाणु युद्ध' का ही रास्ता बचता है।
इतिहास से सबक की जरूरत: चूंकि अमेरिका पूर्व में जापान पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर चुका है, इसलिए दुनिया को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वह दोबारा ऐसा नहीं कर सकता। यदि ईरान, इजरायल को मटियामेट करने के इरादे से सैकड़ों मिसाइलों से एक साथ हमला करता है, तो ट्रंप की 'अस्तित्व खत्म कर देने' की धमकी हकीकत में बदल सकती है।
वैश्विक समुदाय को इस 'जैसे को तैसा' (Tit for Tat) वाले हमलों के सिलसिले को महज एक क्षेत्रीय विवाद समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यदि इस टकराव को तुरंत कूटनीतिक प्रयासों से खत्म नहीं किया गया, तो पूरी मानवता को एक अभूतपूर्व विनाश का सामना करना पड़ सकता है।