सफल हो पाएंगी पानी से चलने वाली गाड़ियां? सड़क पर दौड़ेगी 'उम्मीद की भाप': जानिए कैसे 'ग्रीन हाइड्रोजन' बदलने जा रहा है भारतीय ऑटोमोबाइल की तस्वीर

पेट्रोल-डीजल से सस्ता और सीएनजी से भी साफ; 10 हाईवे कॉरिडोर से शुरू हुआ भारत का हाइड्रोजन सफर

10 Jul 2026  |  931

 

 

नई दिल्ली।

भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर इस समय इतिहास के सबसे बड़े और क्रांतिकारी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पेट्रोल और डीजल की पारंपरिक धुंध से निकलकर सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के रास्ते देश अब भविष्य के सबसे स्वच्छ ईंधन यानी 'हाइड्रोजन युग' में प्रवेश कर चुका है। केंद्र सरकार ने पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने और महंगे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू कर दिया है। इसके तहत देश के 10 प्रमुख हाईवे कॉरिडोर पर हाइड्रोजन फ्यूल से चलने वाले वाहनों का पायलट प्रोजेक्ट (ट्रायल) चलाया जा रहा है।

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की सराहना करते हुए कहा, "भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग वैकल्पिक ईंधन और बायो-फ्यूल टेक्नोलॉजी के विकास में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। भविष्य के परिवहन में हाइड्रोजन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है।"

इन 10 रूट्स पर हो रहा है भविष्य का ट्रायल

सरकार इस तकनीक को जमीन पर परखने के लिए देश के 10 बड़े हाईवे रूट्स पर परीक्षण कर रही है। इन रूट्स में शामिल हैं:

ग्रेटर नोएडा-दिल्ली-आगरा

भुवनेश्वर-कोणार्क-पुरी

अहमदाबाद-वडोदरा-सूरत

साहिबाबाद-फरीदाबाद-दिल्ली

पुणे-मुंबई

जमशेदपुर-कलिंग नगर

तिरुवनंतपुरम-कोच्चि

कोच्चि-एडप्पल्ली

जामनगर-अहमदाबाद

NH-16 विशाखापत्तनम-बय्यावारम

इस ट्रायल का मुख्य उद्देश्य हाइड्रोजन वाहनों के वास्तविक प्रदर्शन, लंबी दूरी तय करने की उनकी क्षमता, रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की संभावनाओं और इसके व्यावसायिक इस्तेमाल की लागत का सटीक आकलन करना है।

बजट और विज़न: 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन'

जनवरी 2023 में स्वीकृत हुए इस मिशन के तहत सरकार ने वित्त वर्ष 2029-30 तक 19,744 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है।

लक्ष्य: वर्ष 2030 तक सालाना कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना।

निवेश: इसके लिए 125 GW की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता विकसित की जाएगी और 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश होगा।

फायदा: इस मिशन की सफलता से देश में 50 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम होगा और 6 लाख से अधिक नए रोजगार पैदा होंगे।

पहले कमर्शियल वाहन, फिर आपकी निजी कार

सरकार की रणनीति के अनुसार, साल 2026 से 2030 के बीच इस फ्यूल का ट्रायल बसों, ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों में किया जाएगा। 2030 के बाद जब देश में उत्पादन लक्ष्य हासिल हो जाएगा और रिफ्यूलिंग स्टेशनों का जाल बिछ जाएगा, तब इसे आम जनता की निजी कारों के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा।

जेब पर कितना हल्का? (1000 किलोमीटर के सफर का गणित)

ग्रीन हाइड्रोजन न सिर्फ पर्यावरण बल्कि आपकी जेब के लिए भी सबसे किफायती सौदा साबित होने जा रहा है। आइए तुलनात्मक नजरिए से देखें:

ईंधन का प्रकारऔसत माइलेजवर्तमान अनुमानित कीमत1,000 KM का कुल खर्च
पेट्रोल20 KM/L₹100 / लीटर₹5,000
डीजल20-25 KM/L₹92 / लीटर₹4,600
सीएनजी27 KM/KG₹76 / किलोग्राम₹2,812
हाइड्रोजन100 KM/KG₹279 / किलोग्राम₹2,790

वर्तमान में भी हाइड्रोजन का खर्च सीएनजी से कम बैठता है। हाल ही में नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि भारत में ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत घटकर 279 रुपये प्रति किलो पर आ गई है, जो एक वैश्विक मानक है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक इसे 200 रुपये प्रति किलो से नीचे लाने का है, जिसके बाद यह सफर और भी सस्ता हो जाएगा।

कैसे काम करती है यह 'जादुई' तकनीक?

हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहनों (FCEV) में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच एक रासायनिक प्रतिक्रिया (Chemical Reaction) कराई जाती है। इस प्रक्रिया से बिजली (Electricity) पैदा होती है, जिससे गाड़ी का मोटर चलता है। सबसे खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के बाद साइलेंसर से कोई जहरीला धुआं नहीं, बल्कि सिर्फ पानी की भाप बाहर निकलती है। यानी प्रदूषण शून्य प्रतिशत!

चुनौतियों का पहाड़: लक्ष्य अभी दूर है

यद्यपि यह योजना बेहतरीन है, लेकिन भारत के सामने इसकी राह में कुछ बड़ी तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं:

धीमी शुरुआत: फरवरी 2026 तक भारत की सालाना ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता लगभग 8,000 टन ही पहुंच पाई है, जो कि 2030 के मुख्य लक्ष्य (5 मिलियन मीट्रिक टन) का महज 0.16 प्रतिशत है।

समय की कमी: 2030 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अब सिर्फ 4 साल का समय बचा है।

यदि भारत को इस मिशन का असली लाभ उठाना है, तो सौर और पवन ऊर्जा के माध्यम से ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन की रफ्तार को युद्धस्तर पर बढ़ाना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो इस ग्रीन मिशन की समयसीमा को आगे बढ़ाना पड़ सकता है। बहरहाल, सरकार के मौजूदा कदम इस बात का साफ संकेत हैं कि भारत क्लीन एनर्जी के मामले में वैश्विक लीडर बनने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा चुका है।

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