नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ऑस्ट्रेलिया दौरे के बीच दोनों देशों के बीच हुए यूरेनियम निर्यात समझौते को लेकर देश में एक नया सियासी घमासान छिड़ गया है। इस रणनीतिक सफलता का श्रेय लेने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच सोशल मीडिया पर जबरदस्त 'क्रेडिट वॉर' (श्रेय लेने की जंग) शुरू हो गई है।
एक तरफ जहां भाजपा इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक प्रतिष्ठा और कूटनीतिक जीत बता रही है, वहीं कांग्रेस ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे मनमोहन सिंह सरकार के दौर की मेहनत का नतीजा बताया है।
अमित मालवीय का दावा: "2010 में मना करने वाला ऑस्ट्रेलिया अब बना साझेदार"
इस विवाद की शुरुआत भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। मालवीय ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा:
"साल 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं करने का हवाला देते हुए भारत को यूरेनियम बेचने से साफ इनकार कर दिया था। लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम निर्यात समझौता संपन्न हुआ है।"
उन्होंने आगे कहा कि यह केवल यूरेनियम मिलने का मामला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ी हुई साख को दर्शाता है। भारत को अब दुनिया प्रतिबंधों के नजरिये से नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रही है।
जयराम रमेश का पलटवार: "भाजपा तंत्र फैला रहा है झूठ"
भाजपा के इन दावों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने भाजपा को आड़े हाथों लिया। उन्होंने ट्वीट कर कहा, "भाजपा का पूरा तंत्र यह दिखाने में जुटा है कि ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारत को यूरेनियम की बिक्री प्रधानमंत्री मोदी की कोई नई और बड़ी उपलब्धि है। जबकि हकीकत कुछ और है।"
जयराम रमेश ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए सिलसिलेवार ढंग से तथ्य सामने रखे:
2011 की मंजूरी: कांग्रेस नेता ने बताया कि 4 दिसंबर 2011 को ही तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने अपनी 'लेबर पार्टी' से भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी हासिल कर ली थी।
परमाणु समझौते का असर: यह ऐतिहासिक स्वीकृति अक्टूबर 2008 में कांग्रेस (यूपीए) सरकार के समय हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद संभव हो सकी थी।
सबूत के तौर पर साझा किया पुरानी खबरों का 'स्क्रीनशॉट'
अपने दावों को मजबूती देने के लिए जयराम रमेश ने दिसंबर 2011 की अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के स्क्रीनशॉट भी साझा किए। इन खबरों में स्पष्ट रूप से लिखा था कि ऑस्ट्रेलिया की तत्कालीन सत्तारूढ़ लेबर पार्टी ने भारत को यूरेनियम बेचने का रास्ता साफ करने वाली नीति का समर्थन किया था।
भाजपा पर तंज कसते हुए रमेश ने कहा, "भाजपा के ‘ट्रोल’, जिनमें उनके कुछ सांसद भी शामिल हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने से पहले अपना ‘होमवर्क’ बेहतर ढंग से कर लेना चाहिए। कांग्रेस हमेशा नए आयाम बनाती है, जबकि भाजपा दूसरों के काम पर पलटी मारने और श्रेय चुराने में माहिर है।"
निष्कर्ष: कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए यह यूरेनियम डील बेहद अहम है क्योंकि इससे देश के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की जरूरतें पूरी होंगी। हालांकि, इस बड़ी राष्ट्रीय सफलता पर भी देश के भीतर छिड़ा यह राजनीतिक दंगल दिखाता है कि चुनाव और बयानों के दौर में 'क्रेडिट' की सियासत कितनी हावी है।