अमीरी और बेबसी की दो तस्वीरें: पंजाब-हरियाणा के किसान सबसे खुशहाल, झारखंड-ओडिशा और विदर्भ में अब भी पसरी मायूसी

सरकारी गारंटी और आधुनिक तकनीक से मालामाल हुए उत्तर भारत के अन्नदाता; दूसरी तरफ सिंचाई और सही दाम के अभाव में आज भी मॉनसून के भरोसे ‘जुआ’ खेलने को मजबूर पूर्वी भारत का किसान।

10 Jul 2026  |  801

 

 

नई दिल्ली: देश की आधे से ज्यादा आबादी आज भी अपनी आजीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के सभी राज्यों के किसानों की माली हालत एक जैसी नहीं है? देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों की जिंदगी और उनकी कमाई में जमीन-आसमान का अंतर है। एक तरफ जहां कुछ राज्यों के किसान नई टेक्नोलॉजी, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और सरकारी नीतियों के दम पर हर महीने बंपर मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां का किसान आज भी सिर्फ कर्ज और बेरुखे मॉनसून की मार झेलने को मजबूर है।

आइए समझते हैं देश में खेती की इस असमानता की पूरी कहानी और इसके पीछे की मुख्य वजहें।

कमाई में ये राज्य हैं 'टॉप' पर, आर्थिक रूप से हैं बेहद मजबूत

देश में कमाई के लिहाज से देखें तो पंजाब, हरियाणा और मेघालय जैसे राज्यों के किसान इस लिस्ट में सबसे ऊपर आते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा के किसानों की औसत मासिक आय (Average Monthly Income) देश में सबसे ज्यादा है।

आधुनिकता का सहारा: इन राज्यों के किसान केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं हैं। वे आधुनिक मशीनों, एडवांस इरिगेशन सिस्टम (ड्रिप और स्प्रिंकलर) और अच्छी क्वालिटी के हाइब्रिड बीजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।

MSP का तगड़ा सुरक्षा कवच: इन राज्यों में गेहूं और धान जैसी मुख्य फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का सरकारी सिस्टम बेहद मजबूत और सक्रिय है। इसके चलते किसानों को अपनी उपज की गारंटीड और सही कीमत समय पर मिल जाती है। यही वजह है कि यहाँ के किसान आर्थिक रूप से काफी समृद्ध और सुरक्षित हैं।

यहाँ के किसानों की जिंदगी में अब भी घुला है दर्द

इस चमकती तस्वीर के उलट देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां किसानों की हालत आज भी चिंताजनक बनी हुई है। झारखंड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के किसानों की मासिक कमाई देश में सबसे कम आंकी गई है। इसके अलावा महाराष्ट्र का विदर्भ और मराठवाड़ा इलाका तो दशकों से किसान संकट का केंद्र बना हुआ है।

खुशहाल क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा आदि)संकटग्रस्त क्षेत्र (झारखंड, ओडिशा, विदर्भ आदि)
90% से अधिक क्षेत्रों में पुख्ता सिंचाई व्यवस्था।खेती आज भी 70-80% केवल मॉनसून के भरोसे।
सरकारी मंडियों और MSP का पूरा लाभ।बिचौलियों का जाल, मंडियों की कमी और फसल का कम दाम।
नगदी फसलों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग।पारंपरिक खेती और बुनियादी सुविधाओं का अभाव।

 

आखिर क्यों पैदा हुआ यह 'जमीन-आसमान' का अंतर?

पिछड़े राज्यों और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में किसानों की बदहाली के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़ी वजहें काम कर रही हैं:

सिंचाई के पुख्ता इंतजाम न होना: इन इलाकों में नहरों और ट्यूबवेल का नेटवर्क कमजोर होने के कारण खेती पूरी तरह से 'जुआ' बन चुकी है। सूखा, बाढ़ या बेमौसम बारिश होते ही पूरी की पूरी फसल एक झटके में बर्बाद हो जाती है।

बढ़ती लागत और कर्ज का जाल: खाद, बीज और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। जब फसल बर्बाद होती है, तो किसान साहूकारों और बैंकों के कर्ज के दलदल में धंसता चला जाता है।

बाजार और सही दाम का अभाव: इन राज्यों में स्थानीय स्तर पर मजबूत सरकारी खरीद केंद्र न होने से किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बिचौलियों को बेचनी पड़ती है।

निष्कर्ष: यह कड़वी सच्चाई साफ करती है कि जब तक पूर्वी और मध्य भारत के राज्यों में सिंचाई की बुनियादी सुविधाएं और एमएसपी (MSP) जैसी मूल्य गारंटी जमीन पर नहीं पहुंचती, तब तक देश के किसानों के बीच की यह गहरी खाई को पाट पाना नामुमकिन होगा।

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