अंकारा/मॉस्को।
साल 2017 में तुर्की द्वारा रूस से खरीदा गया S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम आज उसके लिए फायदे से ज्यादा बड़ा सिरदर्द बन चुका है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन अब किसी भी तरह इस रूसी सिस्टम से छुटकारा पाना चाहते हैं। मकसद साफ है—अमेरिका के साथ बिगड़े रिश्तों को सुधारना और F-35 स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम में तुर्की की दोबारा एंट्री कराना। तुर्की के अखबार 'हुर्रियत' का दावा है कि अंकारा इस सिस्टम को पश्चिम एशिया (खाड़ी देशों) के किसी देश को ट्रांसफर करने पर विचार कर रहा है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का नाम सबसे आगे है।
क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी इस मुद्दे पर तुर्की के साथ बातचीत की पुष्टि की है, हालांकि उन्होंने इसे ‘बेहद संवेदनशील मामला’ बताते हुए ज्यादा ब्योरा देने से इनकार कर दिया।
क्या तुर्की अपनी मर्जी से बेच सकता है S-400?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी पेच यही है कि तुर्की चाहकर भी अपनी मर्जी से यह सौदा नहीं कर सकता। साल 2017 में हुए रूस-तुर्की समझौते के नियमों के मुताबिक, S-400 सिस्टम को किसी भी तीसरे देश को बेचने या ट्रांसफर करने के लिए मॉस्को (रूस) की लिखित और औपचारिक मंजूरी अनिवार्य है।
अगर ऐसा कोई नियम न होता, तो तुर्की यह सिस्टम अपने करीबी दोस्त पाकिस्तान को भी दे सकता था। लेकिन अब गेंद पूरी तरह व्लादिमीर पुतिन के पाले में है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पुतिन इस सिस्टम को खुद वापस खरीदना पसंद कर सकते हैं या फिर तुर्की पर अपना रणनीतिक दबाव बनाए रखने के लिए इस सौदे को लटका भी सकते हैं।
तुर्की की इस 'डील' से क्यों खड़ी होगी नई मुश्किलें?
अमेरिका की नई टेंशन: अगर तुर्की से S-400 हटता है, तो अमेरिका की एक चिंता दूर होगी। लेकिन अगर यही सिस्टम कतर या UAE पहुंच गया, तो यह अमेरिकी सैन्य ठिकानों के बेहद करीब आ जाएगा। कतर में अमेरिका का 'अल-उदैद एयर बेस' है और UAE में भी अमेरिकी सेना की भारी मौजूदगी है। जिस रूसी रडार को अमेरिका F-35 के लिए खतरा मानता था, उसका अपने ही अड्डों के पास पहुंचना वाशिंगटन को रास नहीं आएगा।
तकनीक लीक होने का खतरा: खाड़ी देशों में इस सिस्टम के आने से अमेरिका को S-400 के रडार, उसकी फ्रीक्वेंसी और कमजोरियों को करीब से समझने का मौका मिल जाएगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि रूस ने इसके 'एक्सपोर्ट मॉडल' की संवेदनशील तकनीकों को पहले ही सीमित रखा है, और यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिम को इसकी काफी जानकारियां पहले ही मिल चुकी हैं।
F-35 के लिए क्यों बेचैन है तुर्की?
तुर्की द्वारा रूस से S-400 खरीदने के बाद अमेरिका ने उसे F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया था और CAATSA के तहत कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। अब अमेरिका में राजनीतिक बदलावों के बीच यह संकेत मिले हैं कि यदि तुर्की S-400 से पीछा छुड़ा लेता है, तो उसके लिए F-35 के दरवाजे फिर खुल सकते हैं। तुर्की के लिए यह सिर्फ एक विमान खरीदने का सौदा नहीं है, बल्कि अरबों डॉलर के रक्षा उद्योग, आधुनिक तकनीक और भविष्य के सैन्य कारोबार से दोबारा जुड़ने का एकमात्र रास्ता है।
क्या भारत बन सकता है खरीदार? क्या भारत बचाएगा तुर्की को?
शुरुआती रक्षा विश्लेषणों में यह कयास लगाए गए थे कि भारत इस सिस्टम का खरीदार हो सकता है, क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से ही S-400 का संचालन कर रही है और उसके पास इसका व्यावहारिक अनुभव भी है।
ठंडे रिश्तों ने रोकी राह: वर्तमान भू-राजनीतिक स्थितियों को देखें तो भारत द्वारा तुर्की की मदद करने या उससे S-400 खरीदने की संभावना न के बराबर है। पाकिस्तान के मुद्दे पर तुर्की का रुख और भारत के साथ उसके हालिया कूटनीतिक मतभेदों के कारण दोनों देशों के रिश्ते काफी ठंडे हैं। ऐसे में भारत इस सौदे से पूरी तरह दूर ही रहेगा।