नई दिल्ली/वाशिंगटन:
अमेरिका द्वारा प्रस्तावित 12.5 फीसदी के अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) पर भारत ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। भारत सरकार ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के सामने अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराते हुए इस एकतरफा फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है। भारत ने दोटूक लहजे में कहा है कि दोनों महाशक्तियों के बीच व्यापारिक विवादों का समाधान एकतरफा कदमों से नहीं, बल्कि द्विपक्षीय बातचीत और आपसी सहमति से ही होना चाहिए।
'धारा 301' की जांच पर भारत ने दागे तीखे सवाल
यह पूरा विवाद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की ‘धारा 301’ के तहत की गई एक कथित जांच से शुरू हुआ है, जिसमें कुछ देशों पर बंधुआ मजदूरी (Forced Labour) से बने उत्पादों को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर कार्रवाई की वकालत की गई है।
वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने 8 जुलाई को वाशिंगटन में हुई सार्वजनिक सुनवाई के दौरान भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने USTR की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसमें कई गंभीर तथ्यात्मक और कानूनी खामियां गिनाईं:
सबूतों का अभाव: व्यापक टैरिफ लगाने के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत होने चाहिए, लेकिन अमेरिकी रिपोर्ट पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं है।
संवैधानिक प्रतिबद्धता: भारत बंधुआ मजदूरी को खत्म करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। यह न केवल देश का संवैधानिक दायित्व है, बल्कि भारत अंतरराष्ट्रीय श्रम नियमों का भी पूरी तरह पालन करता है।
46 देशों को एक ही तराजू में तौलना गलत
भारतीय पक्ष ने सुनवाई के दौरान अमेरिकी नीति की विसंगतियों को उजागर करते हुए कहा कि USTR ने अपनी रिपोर्ट में भारत समेत दुनिया के 46 अलग-अलग देशों को एक ही श्रेणी में रख दिया है, जबकि हर देश की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं। अमेरिका यह स्पष्ट करने में पूरी तरह नाकाम रहा है कि आखिर पूरे देश पर सामूहिक रूप से अतिरिक्त शुल्क लगाने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? यह रिपोर्ट कुछ चुनिंदा मामलों और सामान्य रुझानों के आधार पर मनमाने ढंग से तैयार की गई है।
"अमेरिका यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है कि भारतीय आयात नीतियों के कारण अमेरिकी उद्योगों को कोई अनुचित नुकसान हुआ है। जब नुकसान का कोई आधार ही नहीं है, तो अतिरिक्त शुल्क लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।"
— बृज मोहन मिश्रा, संयुक्त सचिव (वाणिज्य विभाग)
भारतीय उद्योग जगत (FICCI, CII और APEDA) का मिला साथ
इस सुनवाई के दौरान केवल सरकार ही नहीं, बल्कि भारत के प्रमुख उद्योग संगठनों और निर्यात प्राधिकरणों ने भी अमेरिकी प्रस्ताव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया:
APEDA की दलील: कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के प्रतिनिधि श्रेयांश गुप्ता ने स्पष्ट किया कि भारत में चावल का आयात-निर्यात बेहद सीमित और सख्त निगरानी के तहत होता है, इसलिए बंधुआ मजदूरी जैसे आरोप बेबुनियाद हैं।
FICCI और CII का विरोध: देश के शीर्ष उद्योग संगठनों (FICCI और CII) ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका यह 12.5% का टैरिफ लागू करता है, तो इसका नुकसान सिर्फ भारतीय निर्यातकों को नहीं होगा। इससे अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ेगी और वहां के आम उपभोक्ताओं को महंगाई का झटका झेलना पड़ेगा।
क्या होगा अगला कदम?
गौरतलब है कि USTR ने इस साल मार्च में 'धारा 301' के तहत यह जांच शुरू की थी। हालांकि, अंतिम फैसला लेने से पहले अमेरिका को इन सभी आपत्तियों पर विचार करना होगा। भारत ने साफ कर दिया है कि वह आर्थिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अमेरिका के साथ लगातार संवाद और परामर्श के जरिए इस मसले को सुलझाने के लिए भी तैयार है।