झारखंड में 'महागठबंधन' की रार: हाशिए पर वित्त मंत्री, बेपरवाह सोरेन, हेमंत सोरेन की निश्चिंतता का क्या है राज?

सुरक्षा घेरा त्यागा, दिल्ली में खरगे से लगाई गुहार; क्या कांग्रेस को दरकिनार कर नया 'सियासी समीकरण' साध रहे हैं हेमंत सोरेन?

12 Jul 2026  |  894

 

 

विशेष रिपोर्ट | रांची/नई दिल्ली

रांची। झारखंड की सियासत इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और अनसुलझी दिशा की ओर मुड़ चुकी है। सूबे के 'महागठबंधन' (JMM, कांग्रेस, राजद और वाम दल) की सरकार में अंदरूनी कलह अब खुलकर सड़कों पर आ गई है। सरकार में शामिल 12 विधायकों वाली कांग्रेस के कोटे से वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बीच चल रही खटपट ने अब एक गंभीर राजनैतिक संकट का रूप ले लिया है। आलम यह है कि वित्त मंत्री ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपने सुरक्षा कर्मियों को वापस लौटा दिया है, लेकिन मुख्यमंत्री इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह बेपरवाह नजर आ रहे हैं।

रांची से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक राधाकृष्ण किशोर अपनी उपेक्षा का रोना रो रहे हैं, मगर हैरत की बात यह है कि गठबंधन का कोई भी दल उनकी इस पीड़ा को गंभीरता से नहीं ले रहा है।

सुरक्षा कर्मियों की वापसी: गाड़ी के फेर में स्वाभिमान का सवाल

वित्त मंत्री की इस ताजा नाराजगी की वजह कोई बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया। दरअसल, राधाकृष्ण किशोर की नाराजगी राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से है। उन्होंने अपने सुरक्षा कर्मियों के लिए डीजीपी से एक अतिरिक्त वाहन की मांग की थी। मंत्री का तर्क था कि वर्तमान में उपलब्ध गाड़ियों में सुरक्षा जवानों को ठूंस कर बैठना पड़ता है, जिससे उन्हें असुविधा होती है।

जब अनसुनी हुई मांग: डीजीपी ने जब वित्त मंत्री की इस मांग को अनसुना कर दिया, तो किशोर का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने तत्काल प्रभाव से अपनी सुरक्षा में तैनात जवानों को वापस भेज दिया। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह रही कि इस बड़े कदम के बाद भी मुख्यमंत्री या डीजीपी की तरफ से उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

दिल्ली दरबार में हाजिरी: खरगे से मिले, पर समाधान नहीं!

इस हास्यास्पद और अपमानजनक स्थिति से क्षुब्ध होकर राधाकृष्ण किशोर सीधे दिल्ली पहुंचे। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात कर अपनी व्यथा सुनाई। हालांकि, उन्होंने इसे झारखंड की सामान्य सियासी स्थिति पर चर्चा बताया, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह साफ है कि वे अपनी उपेक्षा की शिकायत लेकर ही शीर्ष नेतृत्व के पास गए थे। खरगे से उन्हें क्या आश्वासन मिला, या फिर पार्टी ने उन्हें चुप रहने या इस्तीफा देने में से क्या सलाह दी, इस पर अभी सस्पेंस बरकरार है।

उपेक्षा की बानगी: दिल्ली के सरकारी कार्यक्रम से ही गायब

सरकार में वित्त मंत्री की उपेक्षा अब जगजाहिर हो चुकी है। हाल ही में झारखंड में निवेश आकर्षित करने के लिए दिल्ली में एक बड़े सरकारी कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत पूरा सरकारी अमला दिल्ली में था। दिलचस्प बात यह है कि राधाकृष्ण किशोर भी उस वक्त दिल्ली में ही मौजूद थे, लेकिन वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। जब उनसे वजह पूछी गई, तो उनका दर्द छलक पड़ा—"मुझे आमंत्रण ही नहीं मिला था।"

इसके अलावा, जिला स्तर की नौकरियों में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने की उनकी सलाह को भी सरकार ने सिरे से ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, जेएमएम कोटे के कुछ मंत्रियों ने उन पर फाइलों को अटकाने का आरोप मढ़कर उन्हें और जलील करने का प्रयास किया।

हेमंत सोरेन की निश्चिंतता का क्या है राज?

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि हेमंत सोरेन जान-बूझकर राधाकृष्ण किशोर की अनदेखी कर रहे हैं, क्योंकि इस वक्त मुख्यमंत्री के 'दोनों हाथों में लड्डू' हैं। सोरेन की इस निश्चिंतता के पीछे दो मुख्य वजहें मानी जा रही हैं:

सरयू राय का 'गैर-कांग्रेसी' फॉर्मूला: जेडीयू विधायक सरयू राय ने हेमंत सोरेन को एक नया सियासी समीकरण सुझाया है। इसके तहत जेएमएम, राजद, वाम दल और जेडीयू को मिलाकर बिना कांग्रेस और भाजपा के भी बहुमत का आंकड़ा आसानी से जुटाया जा सकता है।

भाजपा से बढ़ती नजदीकियां: पिछले कुछ महीनों से राज्य में भाजपा और जेएमएम के बीच बढ़ती नजदीकियों के कयास लगाए जा रहे हैं।

राज्यसभा चुनाव की टीस
हालिया राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत हुई, जबकि पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी हार गए। इस हार ने गठबंधन की दरार को और चौड़ा कर दिया। कांग्रेस ने इसका ठीकरा राजद पर फोड़ा और दोनों दलों में जमकर आरोप-प्रत्यारोप हुआ।

आत्मसमर्पण या इस्तीफा: अब क्या करेंगे वित्त मंत्री?

यह स्थिति तब और पेचीदा हो जाती है जब हम देखते हैं कि कांग्रेस कोटे के अन्य दो मंत्री—दीपिका पांडेय और इरफान अंसारी—सरकार में बेहद सहज हैं और दिल्ली के कार्यक्रम में भी मुख्यमंत्री के साथ अग्रिम पंक्ति में दिखे। ऐसे में केवल राधाकृष्ण किशोर को ही पग-पग पर प्रताड़ित होना पड़ रहा है।

अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो समझदार वित्त मंत्री के सामने केवल दो ही रास्ते बचते दिखाई दे रहे हैं—या तो वे आत्मसम्मान की रक्षा के लिए खुद मंत्री पद का त्याग कर दें, या फिर इसी तरह सरकार में रहते हुए कदम-कदम पर उपेक्षा और जिल्लत का घूंट पीते रहें।

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