विशेष राजनीतिक विश्लेषण | लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव जहां 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के दम पर सत्ता का सूखा खत्म करने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वहीं योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने इस नारे की ऐसी काट खोजी है जो यूपी की सियासत को हिलाने का माद्दा रखती है।
राजभर ने अखिलेश के 'पीडीए' का मतलब बदलते हुए उसे ‘पीट देगा अहीर’ और ‘पीट देगा अल्पसंख्यक’ करार दिया है। सुनने में भले ही यह एक कड़ा राजनीतिक जुमला लगे, लेकिन यूपी की जमीनी हकीकत और जातियों के आपसी समीकरणों से वाकिफ लोग जानते हैं कि यह बयान अखिलेश यादव की दुखती रग पर सीधा प्रहार है।
अखिलेश को आखिर क्यों पड़ी 'PDA' की जरूरत?
समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक हमेशा से ‘M-Y’ (मुस्लिम और यादव) माना जाता रहा है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो:
यादव आबादी: लगभग 9 से 10 प्रतिशत
मुस्लिम आबादी: करीब 19 प्रतिशत
इन दोनों का गठजोड़ करीब 30% वोटों का आधार तैयार करता है, लेकिन यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए कम से कम 40% वोटों की दरकार होती है। इसी अंतर को पाटने के लिए अखिलेश यादव ने गैर-यादव पिछड़ों और दलितों (D) को अपने पाले में लाने के लिए 'PDA' का ताना-बाना बुना था। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में 'संविधान बचाने' की मुहिम के तहत दलितों का एक बड़ा तबका सपा के साथ आया भी, लेकिन राजभर का ताजा बयान इस नए नैरेटिव को झटका देने की एक सोची-समझी रणनीति है।
राजभर के बयान को क्यों माना जा रहा है 'मास्टरस्ट्रोक'?
ओम प्रकाश राजभर जमीनी स्तर पर अति-पिछड़ी (मोस्ट बैकवर्ड) जातियों की नब्ज को गहराई से पहचानते हैं। 'पीट देगा अहीर' का नारा देकर वे असल में दलितों और अति-पिछड़ों (राजभर, निषाद, मौर्य, कुम्हार, नाई आदि) के मन में यह शंका डाल रहे हैं कि अखिलेश यादव के मीठे वादों के झांसे में न आएं।
गांवों का पुराना नैरेटिव: राजभर का सीधा संदेश है कि चुनावी गठबंधन अपनी जगह है, लेकिन सत्ता में आते ही ग्रामीण स्तर पर यादव और दबंग जातियां मजबूत हो जाएंगी, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ेगा और कमजोर तबकों का पुनः शोषण शुरू हो सकता है।
इतिहास के वो तीन पन्ने, जो सपा का पीछा नहीं छोड़ते
बीजेपी और उसके सहयोगी दल अक्सर पूर्ववर्ती सपा सरकारों के दौर को 'गुंडाराज' और एकतरफा रसूख का काल बताकर प्रचारित करते हैं। राजभर का बयान इसी अतीत के कड़वे अनुभवों को भुनाने की कोशिश है:
1. 1995 का ऐतिहासिक गेस्ट हाउस कांड
जून 1995 में जब बसपा ने सपा से गठबंधन तोड़ा, तो लखनऊ के मीराबाई गेस्ट हाउस में मायावती पर हुआ हमला देश की राजनीति का एक काला अध्याय बन गया। दलित समाज इस घटना को एक गहरे सदमे के रूप में देखता है, जो यह संदेश देता है कि दोनों दलों के जमीनी कार्यकर्ताओं में तालमेल बैठाना कितना कठिन है।
2. प्रमोशन में आरक्षण बिल का विरोध
सपा सरकार के दौरान संसद के भीतर जब दलितों के लिए प्रमोशन में आरक्षण का बिल लाया गया था, तो सपा सांसदों ने इसका पुरजोर विरोध किया था और सदन के पटल पर बिल की कॉपियां तक फाड़ दी थीं। यह मुद्दा आज भी पढ़े-लिखे दलित वर्ग के बीच एक संवेदनशील विषय बना हुआ है।
3. महापुरुषों के स्मारकों और योजनाओं के नामों में बदलाव
अखिलेश यादव की सरकार आते ही मायावती शासनकाल में संत रविदास, डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के नाम पर शुरू की गई कई योजनाओं और जिलों के नाम बदल दिए गए थे (जैसे संतरविदास नगर को पुनः भदोही करना)। इसे विपक्ष आज भी दलित प्रतीकों के अनादर के रूप में पेश करता है।
थानों की सियासत और ग्रामीण संघर्ष
| सपा शासन को लेकर विपक्ष का पुराना नैरेटिव |
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प्रशासनिक रसूख: आरोप लगते रहे हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों में स्थानीय पुलिस थानों और तहसीलों में एक विशेष वर्ग की ही सुनवाई होती थी, जिससे आम दलित या अति-पिछड़ा वर्ग अपनी शिकायत दर्ज कराने में भी असुरक्षित महसूस करता था।
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निष्कर्ष: क्या ढह जाएगी 'PDA' की दीवार?
यद्यपि अखिलेश यादव इन पुरानी घटनाओं और शिकायतों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित और फर्जी बताते रहे हैं, लेकिन ओम प्रकाश राजभर जैसे जमीन से जुड़े नेताओं द्वारा बार-बार अतीत की कड़वाहट को कुरेदना सपा के लिए चिंता का सबब जरूर है। 2027 की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अखिलेश यादव को न सिर्फ अपना 'PDA' कुनबा सहेज कर रखना होगा, बल्कि अति-पिछड़ों और दलितों के मन में बैठे इस पुराने 'असुरक्षा भाव' को भी पूरी शिद्दत से दूर करना होगा।