भोपाल
सरकारी दफ्तरों में 'कल आना' और फाइलों को लटकाने वाले ढुलमुल रवैये पर मध्य प्रदेश सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। प्रदेश में अब यदि तय समयसीमा के भीतर किसी नागरिक का सरकारी काम नहीं हुआ, तो इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारियों की जेब ढीली होगी। सरकार ने ऐतिहासिक 'लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2010' में एक बड़ा संशोधन करते हुए लेटलतीफ अफसरों पर भारी पेनल्टी लगाने और स्वतः (बिना शिकायत के) कार्रवाई करने का नया नियम लागू कर दिया है।
प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए लोक सेवा गारंटी पोर्टल में भी आवश्यक तकनीकी बदलाव किए जा रहे हैं।
16वें दिन खुद शुरू हो जाएगा 'एक्शन': अपील का इंतजार खत्म
अब तक की व्यवस्था में समय पर काम न होने पर पीड़ित नागरिक को खुद अपीलीय अधिकारी के पास शिकायत (अपील) दर्ज करानी पड़ती थी। लेकिन नए संशोधन के बाद सरकार ने यह बाध्यता खत्म कर दी है:
स्वतः संज्ञान (Suo Motu): यदि निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद भी किसी नागरिक के आवेदन का निपटारा नहीं होता है, तो 16वें दिन प्रथम और द्वितीय अपीलीय अधिकारी खुद मामले का संज्ञान लेंगे।
सीधे समीक्षा: अधिकारी बिना किसी शिकायत का इंतजार किए लंबित प्रकरण की फाइल खोलेंगे, उसकी समीक्षा करेंगे और लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।
लापरवाही की कीमत: प्रतिदिन ₹250 और अधिकतम ₹5,000 का जुर्माना
नए कड़े नियमों के तहत लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर वित्तीय दंड लगाने का पूरा खाका तैयार किया गया है। इस उद्देश्य के लिए दोनों अपीलीय अधिकारियों को 'सिविल न्यायालय' (Civil Court) की शक्तियां दी गई हैं:
| देरी / लापरवाही का प्रकार | जुर्माने का प्रावधान (₹ में) |
|---|---|
| प्रतिदिन की देरी पर | ₹250 प्रतिदिन (अधिकतम ₹5,000 तक) |
| बिना पर्याप्त कारण सेवा न देने पर | ₹500 से ₹5,000 तक (एकमुश्त जुर्माना) |
नोट: प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत जुर्माना लगाने से पहले संबंधित अधिकारी को अपनी बात रखने और सुनवाई का एक मौका दिया जाएगा।
आम जनता के पास क्या हैं अधिकार?
यदि किसी व्यक्ति को निर्धारित समय के भीतर सेवा नहीं मिलती या उसका आवेदन बिना वैध कारण के खारिज कर दिया जाता है, तो नागरिक 30 दिनों के भीतर प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास जा सकते हैं। इस आदेश से भी संतुष्ट न होने पर 60 दिनों के भीतर द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अंतिम गुहार लगाई जा सकती है।
देश का पहला 'सेवा का अधिकार' कानून है एमपी का मॉडल
यह जानना जरूरी है कि मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2010 में 'लोक सेवा गारंटी अधिनियम' लागू किया था, जो पूरे भारत का पहला 'सेवा का अधिकार कानून' (Right to Service Act) बना। इस कानून का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को तय समय-सीमा के भीतर सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी देना है। वर्तमान में इस महत्वाकांक्षी कानून के दायरे में मध्य प्रदेश के 32 सरकारी विभागों की 665 प्रमुख सेवाएं शामिल हैं, जिनका सीधा सरोकार आम जनता के रोजमर्रा के कामों से है।