भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट की दोनों पक्षों से धैर्य रखने की अपील, कहा- 'संवेदनशीलता समझें, हर शब्द पर बरतें सावधानी, केंद्र और एमपी सरकार को नोटिस

अदालत ने दिए रोज़ाना सुनवाई के संकेत; नमाज़ के लिए परिसर के पास अलग जगह तय करने का प्रस्ताव, एएसआई को बिना अनुमति संरचनात्मक बदलाव न करने के आदेश।

14 Jul 2026  |  1139

 

 

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक और विवादित 11वीं सदी के भोजशाला-कमल मौला परिसर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेहद अहम सुनवाई की। मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए शीर्ष अदालत ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति और धैर्य बनाए रखने की अपील की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला बेहद संवेदनशील है, इसलिए न्यायालय कक्ष के भीतर और बाहर इस्तेमाल किए जाने वाले हर एक शब्द को लेकर अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले को सुलझाने के लिए रोज़ाना सुनवाई करने की तत्परता भी जताई है।

अंतरिम व्यवस्था: नमाज़ के लिए अलग जगह का प्रस्ताव

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बीच का रास्ता निकालने का संकेत दिया। अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों के अधिकारों को प्रभावित किए बिना, अंतरिम उपाय के तौर पर मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज अदा करने के लिए परिसर के पास ही कोई खुली जगह दी जा सकती है।

इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण' (ASI) को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भोजशाला परिसर की मूल संरचना में कोई भी बदलाव (Structural Changes) न करे। अदालत ने इस मामले में केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है।

"ये बहुत संवेदनशील मामले हैं। कोर्ट में जो कहा जा रहा है, उससे बेवजह विवाद पैदा हो सकते हैं या समाज में गलत संदेश जा सकता है। हमें बेहद सतर्क रहना होगा।"सुप्रीम कोर्ट पीठ की मौखिक टिप्पणी

हाई कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पक्ष ने दी चुनौती

यह पूरी सुनवाई मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर हो रही है, जिसमें धार जिले के इस विवादित परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर माना गया था।

मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने आनन-फानन में ऐसा आदेश लागू कर दिया जिससे मुस्लिम समुदाय को परिसर से पूरी तरह बाहर कर दिया गया। उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई कि इस खास कॉम्प्लेक्स का ऐतिहासिक महत्व है और वहां नमाज़ जारी रहनी चाहिए।

1997 के समझौते का हवाला: मुस्लिम पक्ष ने 1997 के उस जिला कलेक्टर और एएसआई के ऐतिहासिक आदेश का जिक्र किया, जिसके तहत एक व्यवस्था बनी थी। इस व्यवस्था के अनुसार, हिंदू समुदाय को मंगलवार और बसंत पंचमी पर पूजा करने तथा मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति थी।

सॉलिसिटर जनरल की दलील और कोर्ट का रुख

सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मूल रूप से वहां देवी की एक मूर्ति थी, जो वर्तमान में लंदन में है। उन्होंने कहा कि फिलहाल वहां प्रतीकात्मक तस्वीर रखकर प्रतिदिन पूजा की जा रही है। सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार अंतरिम व्यवस्था (Ad-hoc Arrangement) के तहत नमाज़ के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर सहयोग करने के लिए तैयार है।

मुख्य न्यायाधीश ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती और राज्य की स्थिति को देखते हुए कहा कि इस मामले को 10 से 15 दिनों के भीतर एक उपयुक्त पीठ के सामने अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है। अदालत ने साफ किया कि वह ऐसा तदर्थ (Ad-hoc) इंतजाम चाहती है जिससे किसी भी पक्ष के अधिकार प्रभावित न हों और शांति व्यवस्था बनी रहे।

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