सियासी हकीकत: झंडा बदलने से नहीं बदलता वोटर का मूड, पाला बदलने वाले कितने दल-बदलू सांसद चुनाव जीते, कितने हारे, स्ट्राइक रेट रहा था शून्य प्रतिशत

2019 में दल-बदलुओं का स्ट्राइक रेट रहा था 0%; 2024 में बीजेपी के 110 'बाहरी' उम्मीदवारों में से 69 हारे, पर ADR बोला— चुनाव हारे या जीते, 39% बढ़ गया बैंक बैलेंस।

18 Jul 2026  |  1116

 

 

नई दिल्ली

भारतीय राजनीति में चुनाव आते ही नेताओं का अपनी वफादारी और पार्टी बदलना एक आम बात है। नेताओं को अक्सर लगता है कि चुनावी हवा को भांपकर पाला बदलने से उनकी जीत की गारंटी पक्की हो जाएगी। लेकिन, ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) के आंकड़े और पिछले दो लोकसभा चुनावों (2019 और 2024) के नतीजे इस धारणा को पूरी तरह खारिज करते हैं। हकीकत यह है कि सिर्फ पार्टी का सिंबल बदलने से जनता का मूड नहीं बदलता, बल्कि चुनावी दगाबाजी करने वालों को मतदाता सबक सिखाने में देर नहीं करते।

2024 का चुनाव: बीजेपी के 'लॉटरी टिकट' साबित हुए 62% बाहरी नेता

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 पर सिमटने के पीछे एक बड़ी वजह दूसरे दलों से आए नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना रही।

टिकट का गणित: एक विश्लेषण के मुताबिक, 2024 में बीजेपी के 441 उम्मीदवारों में से 110 उम्मीदवार (25%) ऐसे थे जो 2014 के बाद दूसरी पार्टियों से आए थे।

जनता का रिजेक्शन: इन 110 दल-बदलू उम्मीदवारों में से 62% (69 नेता) चुनाव हार गए।

ऐन वक्त पर आए नेताओं का हाल: 2023 और 2024 में चुनाव से ठीक पहले बीजेपी का दामन थामने वाले 34 बाहरी नेताओं को टिकट मिला था, जिनमें से 27 को करारी हार का सामना करना पड़ा।

कहां से आए थे ये नेता?

बीजेपी का टिकट पाने वाले 110 बाहरी नेताओं में सबसे बड़ी खेप कांग्रेस (38 नेता) की थी। इसके बाद बसपा से 11, बीआरएस से 9, टीएमसी से 7, बीजेडी से 6 और सपा-राकांपा से 4-4 नेता शामिल थे। अकेले कांग्रेस से आए 38 नेताओं में से 20 को जनता ने सिरे से नकार दिया।

2019 का चुनाव: दल-बदलू सांसदों का स्ट्राइक रेट रहा था 'शून्य'

अगर इतिहास को देखें, तो 2019 के आम चुनाव में भी जनता ने दल-बदलुओं को पानी पिला दिया था। ADR की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2020 के बीच 12 मौजूदा लोकसभा सांसदों ने अपनी पार्टी छोड़कर नई पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था (जिसमें 5 बीजेपी और 5 कांग्रेस में गए थे)। चौंकाने वाली बात यह है कि इन 12 सांसदों में से एक भी नेता चुनाव नहीं जीत सका और स्ट्राइक रेट 0% रहा।

दिग्गज नेताओं का रिपोर्ट कार्ड (2019-2024)

हारने वाले बड़े चेहरे: रवनीत सिंह बिट्टू (लुधियाना), परनीत कौर (पटियाला), गीता कोड़ा, सुशील कुमार रिंकू (जालंधर), मेनका गांधी (10वां चुनाव हारीं), हंस राज हंस और अर्जुन सिंह।

जीतने वाले अपवाद: ज्योतिरादित्य सिंधिया, रवि किशन, जितिन प्रसाद, नवीन जिंदल, रितेश पांडेय, अफजाल अंसारी और राहुल कस्वां।

विरोधाभास: लोकसभा में फेल, राज्यसभा में 100% पास!

जहां जनता के सीधे वोट वाले लोकसभा चुनाव में दल-बदलू नेता औंधे मुंह गिरे, वहीं राज्यसभा की कहानी बिल्कुल जुदा रही। 2016 से 2020 के बीच पाला बदलने वाले सभी 16 राज्यसभा सांसद (जिनमें से अधिकांश कांग्रेस छोड़ बीजेपी में गए) दोबारा चुन लिए गए। इसकी वजह साफ है कि राज्यसभा का चुनाव जनता नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के विधायक और अंदरूनी जोड़-तोड़ तय करती है।

चुनावी नतीजों से बेअसर: बैंक बैलेंस में 39% का बंपर उछाल

भले ही जनता ने इन नेताओं को संसद पहुंचने से रोक दिया हो, लेकिन पाला बदलने का इनका व्यक्तिगत गणित बेहद फायदेमंद रहा। ADR के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि दल-बदल कर दोबारा चुनावी समर में उतरने वाले सांसदों की संपत्ति में औसतन 39% (यानी करीब 5.85 करोड़ रुपये) का भारी इजाफा दर्ज किया गया। यानी सियासत की बाजी हारने के बाद भी तिजोरी भरने में ये नेता कामयाब रहे।

ADR का कड़ा सुझाव: राष्ट्रपति के हाथ में हो कमान

लोकतंत्र के इस मजाक पर गहरी चिंता जताते हुए ADR ने एक बड़ा सुझाव दिया है। संस्था का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत सांसदों को अयोग्य ठहराने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) से छीनकर देश के राष्ट्रपति को दिया जाना चाहिए, ताकि सत्ता पक्ष के प्रभाव से मुक्त होकर निष्पक्ष फैसले लिए जा सकें।

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