ईरान का 'चक्रव्यूह': न निगलते बन रहा, न उगलते... मध्य पूर्व की जंग में कैसे फंसा पाकिस्तान? सऊदी का साथ दें या ईरान से दुश्मनी लें!

खाड़ी में ईरान की 'शतरंज': हूती विद्रोहियों की धमकी ने इस्लामाबाद के सामने खड़ा किया ऐतिहासिक कूटनीतिक संकट

22 Jul 2026  |  1012

 

 

इस्लामाबाद / रियाद: पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में छिड़ी जंग अब केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गई है। ईरान द्वारा बिछाए गए कूटनीतिक और सैन्य जाल में पड़ोसी देश पाकिस्तान इस कदर फंस चुका है कि उसके लिए स्थिति 'न निगलते बन रही है, न उगलते'।

यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले की नई धमकी ने इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा दी है। ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने ऐलान किया है कि वे 'बाब अल-मंदीब' गलियारे और लाल सागर (Red Sea) के रास्ते सऊदी अरब के जहाजों को नहीं गुजरने देंगे। ऐसे में रियाद के सामने संघर्ष में कूदने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है, और इसी के साथ पाकिस्तान पर भी इस जंग में उतरने का भारी दबाव बन गया है।

1. NATO जैसी संधि: भाड़े की सेना का फंदा

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच NATO की तर्ज पर एक रक्षा समझौता है, जिसके तहत सऊदी अरब पर हुआ हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा। कर्ज में डूबे पाकिस्तान ने सऊदी से वित्तीय मदद और सस्ता तेल पाने के लिए यह समझौता किया था। तब तक माना जा रहा था कि यह सुरक्षा कवच मुख्य रूप से इजरायल को साधने के लिए है।

लेकिन इस्लामाबाद ने यह कभी नहीं सोचा था कि उसे सऊदी अरब की तरफ से यमन में जाकर हूती विद्रोहियों से लड़ना पड़ेगा।

सऊदी की मजबूरी: फारस की खाड़ी (Hormuz Strait) में अमेरिका-ईरान तनाव के कारण सऊदी का व्यापार पहले से प्रभावित था। वह 'यानबू बंदरगाह' के जरिए लाल सागर से व्यापार चला रहा था, लेकिन अब हूती विद्रोहियों ने इस रास्ते को भी ठप करने की धमकी दे दी है।

पाकिस्तान की दुविधा: समझौते के मुताबिक सऊदी अरब उम्मीद कर रहा है कि पाकिस्तानी सेना उसकी रक्षा के लिए आगे आए।

2. शांतिदूत बनने की होड़ या ईरान की चाल?

एक तरफ यमन के जरिए सऊदी अरब को जंग में घसीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान के गृह मंत्री इस्कंदर मोमेनी अचानक पाकिस्तान दौरे पर पहुंच गए। ईरान जानबूझकर पाकिस्तान की मध्यस्थता की तारीफ कर रहा है और उसे अमेरिका के साथ शांति वार्ता जारी रखने को कह रहा है।

बड़ा सवाल: अगर पाकिस्तान यमन के हूती विद्रोहियों से लड़ता है, तो वह ईरान का सीधा दुश्मन बन जाएगा। ऐसे में वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ (Peace Broker) कैसे बना रह सकता है?

3. पाकिस्तान के लिए दोधारी तलवार

ईरान के खिलाफ जाना पाकिस्तान के लिए किसी आत्मघाती कदम से कम नहीं होगा:

आंतरिक सुरक्षा और बलूचिस्तान: ईरान और पाकिस्तान की लंबी सीमा मिलती है। सीमा पर स्थित बलूचिस्तान में बलोच विद्रोही पहले से ही इस्लामाबाद के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।

शिया समुदाय का प्रभाव: पाकिस्तान में एक बड़ी शिया आबादी रहती है। ईरान से सीधे टकराव से देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

आर्थिक बदहाली: यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के बुलावे पर सेना नहीं भेजता है, तो सऊदी से मिलने वाली वित्तीय मदद और रियायती तेल बंद हो जाएगा, जिससे कंगाल पाकिस्तान पूरी तरह डिफॉल्ट हो जाएगा।

ईरान की 'चकरघिन्नी' में उलझी दुनिया

ईरान की इस रणनीति ने न केवल पाकिस्तान और सऊदी अरब, बल्कि वाशिंगटन को भी उलझा दिया है।

एक तरफ: हूती विद्रोहियों के जरिए सऊदी अरब पर दबाव बनाया जा रहा है ताकि रियाद अमेरिका से मदद मांगे।

दूसरी तरफ: पाकिस्तान को बातचीत और कूटनीति के जाल में उलझाकर रखा गया है ताकि अमेरिका के साथ सैन्य विकल्प पेचीदा हो जाएं।

निष्कर्ष: ईरान ने रणनीतिक शतरंज की ऐसी चाल चली है जिसमें सऊदी अरब, अमेरिका और पाकिस्तान तीनों एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। पाकिस्तान न तो खुलकर सऊदी का साथ दे पा रहा है और न ही ईरान से दूरी बना पा रहा है। इस्लामाबाद फिलहाल एक ऐसे चक्रव्यूह में कैद है, जिससे निकलने का रास्ता उसे खुद नजर नहीं आ रहा है।

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