वॉशिंगटन / रियाद
ग्लोबल न्यूक्लियर पॉलिसी को लेकर वाशिंगटन एक बार फिर दुनिया के निशाने पर है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार कड़ा रुख अपनाने वाला अमेरिका अब सऊदी अरब के साथ एक उदार परमाणु ऊर्जा समझौते ('123 एग्रीमेंट') को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। रणनीतिक हलकों में अब यह सवाल जोर-शोर से उठ रहा है कि क्या अमेरिका परमाणु अप्रसार (Non-proliferation) के नियमों में दोहरा रवैया अपना रहा है?
रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका सऊदी अरब को नागरिक परमाणु ऊर्जा तकनीक, ईंधन और तकनीकी सहयोग देने के लिए अमेरिकी एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1954 की धारा 123 के तहत '123 एग्रीमेंट' का प्रस्ताव देने जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब में बिजली उत्पादन के लिए सिविल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स विकसित करना है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
इस प्रस्तावित समझौते की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें वह 'गोल्ड स्टैंडर्ड' शामिल नहीं है, जिसे अमेरिका हमेशा से परमाणु प्रसार रोकने की सबसे मजबूत सुरक्षा शर्त मानता आया है।
[ गोल्ड स्टैंडर्ड से छूट ] ──► [ यूरेनियम संवर्धन पर ढील ] ──► [ हथियार बनाने की क्षमता की आशंका ]
संवर्धन और रीप्रोसेसिंग पर रोक नहीं: 'गोल्ड स्टैंडर्ड' हटने का अर्थ है कि सऊदी अरब पर स्वयं यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) करने और इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन के रीप्रोसेसिंग पर कोई स्पष्ट पाबंदी नहीं होगी।
IAEA के कड़े नियमों से राहत: समझौते में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का 'एडिशनल प्रोटोकॉल' शामिल नहीं किया गया है। यह प्रोटोकॉल यूएन एजेंसी को किसी भी देश के परमाणु ठिकानों की कड़ाई से निगरानी और अचानक निरीक्षण का अधिकार देता है।
विशेषज्ञों की चिंता: यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की छूट मिलती है, तो भविष्य में वह इस क्षमता का उपयोग असैन्य दायरे से बाहर जाकर परमाणु हथियार विकसित करने में भी कर सकता है।
क्राउन प्रिंस का 2018 का बयान और गहराता तनाव
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने वर्ष 2018 में एक वैश्विक मंच से स्पष्ट कहा था:
"यदि ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब भी बिना कोई वक्त गंवाए जल्द से जल्द परमाणु हथियार विकसित करेगा।"
सऊदी अरब का लंबे समय से रुख रहा है कि वह भविष्य में यूरेनियम संवर्धन का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहता है। ऐसे समय में जब वॉशिंगटन ईरान के यूरेनियम संवर्धन को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए 'अस्तित्व का खतरा' बताता रहा है, सऊदी अरब को ढील देने के इस कदम से मध्य पूर्व में शक्ति-संतुलन बिगड़ने और परमाणु हथियारों की नई दौड़ शुरू होने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी कांग्रेस में भी उठने लगे विरोध के सुर
यह समझौता जल्द ही मंज़ूरी के लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में पेश किया जा सकता है। हालाँकि, वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस पर आम सहमति नहीं है।
कई डेमोक्रेटिक सांसदों के साथ-साथ रिपब्लिकन नेताओं ने भी समझौते में ढील पर गहरी आपत्ति जताई है।
यहाँ तक कि मौजूदा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी सीनेटर रहते हुए सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते में सख्त सुरक्षा प्रावधान और 'गोल्ड स्टैंडर्ड' शामिल करने की पुरजोर वकालत की थी।
रणनीतिक साझेदारी बनाम परमाणु जोखिम
यह डील महज़ एक असैन्य ऊर्जा समझौता नहीं, बल्कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक है। जहाँ एक तरफ इस कदम से रियाद और वाशिंगटन के रिश्ते नए आयाम पर पहुँचेंगे, वहीं दूसरी ओर पहले से कड़े प्रतिबंधों से घिरा ईरान खुद को और अलग-थलग महसूस कर सकता है, जिससे क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ने की पूरी संभावना है।