एमटीसीआर में शामिल होकर भारत मिसाइल मंडी में अरबों कमा सकता है.
ब्रह्मोस जैसे तकनीक को सदस्य देशों को बेच पाएगा भारत
28 Jun 2016
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भारत का मिसाइल टेक्नॉलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) का सदस्य बनना कई मायने में महत्वपूर्ण है. साल 1987 में बने इस समूह का उद्देश्य दुनिया में मिसाइल तकनीक के व्यापार पर नियंत्रण और निगरानी रखना है. इसी का नतीजा था कि जब रूस ने क्रायोज़निक इंजन देने की कोशिश की थी तो बाक़ी के देशों के विरोध की वजह से रूस ऐसा नहीं कर पाया था.
एमटीसीआर का सदस्य बनने के सबसे बड़ा फायदा है कि हम दुनिया के अन्य देशों के पास मौज़ूद मिसाइल की आधुनिक तकनीक को उनसे हासिल कर सकते हैं. वहीं इसका दूसरा फ़ायदा यह है कि भारत अगर अपनी मिसाइल तकनीक जैसे ब्रह्मोस को अगर किसी दूसरे देश को देना चाहता है, तो वह एमटीसीआर का सदस्य होने की वजह से दे सकता है.
रक्षा विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर एमटीसीआर का सदस्य बनने का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य बताते हैं. बीबीसी को दिये इंटरव्यू में वो कहते हैं कि अब भारत की चुनौती पाकिस्तान के एक्यू ख़ान नेटवर्क को बढ़ने से रोकना है, जिसे पाकिस्तान ने बढ़ावा दिया.एक्यू ख़ान नेटवर्क को दुनिया का न्यूक्लियर वॉलमार्ट भी कहा जाता था. वह परमाणु तकनीक के ग़ैर क़ानूनी धंधे का नेटवर्क था.इसी नेटवर्क के ज़रिए कई देश उन्नत मिसाइल तकनीक को हासिल करने की फ़िराक में थे, इनमें पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं. इसे चीन का समर्थन हासिल था. यह दुनिया के लिए ख़तरा है. इस वक्त एक्यू ख़ान नेटवर्क, अलकायदा, तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआईएस जैसे संगठनों के मिसाइल तकनीक तक पहुंच को रोकना बहुत जरूरी हो गया है. चीन एमटीसीआर का सदस्य नहीं है. लेकिन वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का 2004 से सदस्य है.
एमटीसीआर का सदस्य बनने के सबसे बड़ा फायदा है कि हम दुनिया के अन्य देशों के पास मौज़ूद मिसाइल की आधुनिक तकनीक को उनसे हासिल कर सकते हैं. वहीं इसका दूसरा फ़ायदा यह है कि भारत अगर अपनी मिसाइल तकनीक जैसे ब्रह्मोस को अगर किसी दूसरे देश को देना चाहता है, तो वह एमटीसीआर का सदस्य होने की वजह से दे सकता है.
रक्षा विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर एमटीसीआर का सदस्य बनने का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य बताते हैं. बीबीसी को दिये इंटरव्यू में वो कहते हैं कि अब भारत की चुनौती पाकिस्तान के एक्यू ख़ान नेटवर्क को बढ़ने से रोकना है, जिसे पाकिस्तान ने बढ़ावा दिया.एक्यू ख़ान नेटवर्क को दुनिया का न्यूक्लियर वॉलमार्ट भी कहा जाता था. वह परमाणु तकनीक के ग़ैर क़ानूनी धंधे का नेटवर्क था.इसी नेटवर्क के ज़रिए कई देश उन्नत मिसाइल तकनीक को हासिल करने की फ़िराक में थे, इनमें पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं. इसे चीन का समर्थन हासिल था. यह दुनिया के लिए ख़तरा है. इस वक्त एक्यू ख़ान नेटवर्क, अलकायदा, तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआईएस जैसे संगठनों के मिसाइल तकनीक तक पहुंच को रोकना बहुत जरूरी हो गया है. चीन एमटीसीआर का सदस्य नहीं है. लेकिन वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का 2004 से सदस्य है.