नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विवाद गहराता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव समेत 19 विपक्षी दलों के सांसदों ने सड़कों पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है।
भारतीय इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस स्तर पर विपक्षी दल एकजुट होकर सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर CEC को सीधे निशाना बनाते हुए लिखा— "ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो, टाइम टू रिजाइन" (ज्ञानेश, हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय आ गया है)।
फॉर्म-6 क्या है और इस पर क्यों मचा है बवाल?
सामान्य रूप से वोटर लिस्ट में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए फॉर्म-6 भरा जाता है। हालांकि, SIR प्रक्रिया के दौरान इसमें किए गए 3 प्रमुख बदलावों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है:
- पुरानी लिस्ट का विवरण: नए आवेदक को यह अनिवार्य रूप से बताना होगा कि पहले किसी वोटर लिस्ट में उसका नाम था या नहीं।
- वंशानुगत जानकारी (Ancestral Link): यदि आवेदक का नाम नहीं था, तो क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम पुरानी SIR लिस्ट में दर्ज था?
- गैर-दर्ज श्रेणी: यदि आवेदक या उसके पूर्वजों (माता-पिता/दादा-दादी) में से किसी का नाम पुरानी लिस्ट में नहीं था, तो उसे इसका विशिष्ट ब्योरा देना होगा।
विपक्ष का आरोप है कि ये मनमाने बदलाव आम नागरिकों और नए मतदाताओं के लिए प्रक्रिया को जटिल बनाने और उनके नाम काटने की मंशा से किए गए हैं।
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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्यों बढ़ा विवाद? 3 मुख्य वजहें
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| 1 | आंतरिक असहमति का दावा | मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी, जिसे कथित तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया। |
| 2 | सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण | चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि शीर्ष अदालत ने फॉर्म-6 में बदलावों को कोई अप्रूवल नहीं दिया था। |
| 3 | अदालत में याचिकाएं | याचिकाकर्ता अंजलि भारद्वाज की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि दिल्ली में काटे गए नामों को पुनः जोड़ने के लिए फॉर्म-6 का जबरन इस्तेमाल गलत है। |
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क्या खतरे में है मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी?
विपक्ष भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और संसद के आगामी सत्र में महाभियोग (Impeachment) लाने की बात कर रहा हो, लेकिन ज्ञानेश कुमार का पद फिलहाल सुरक्षित दिखता है:
- विशेष कानूनी सुरक्षा कवच: चुनाव आयोग के नए कानून के तहत CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों को अभूतपूर्व सुरक्षा प्राप्त है। उनके सेवाकाल या रिटायरमेंट के बाद भी आयोग के फैसलों को लेकर उन पर न तो मामला दर्ज किया जा सकता है और न ही कोर्ट में घसीटा जा सकता है।
- अदालत की टिप्पणी: सुनवाई के दौरान जस्टिस जे. बागची ने टिप्पणी की कि यह सुरक्षा कानूनी रूप से राष्ट्रपति जितनी मजबूत है।
- नंबर गेम का गणित: संसद में महाभियोग प्रस्ताव को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत (2/3) की आवश्यकता होती है, जिसमें वर्तमान में विपक्षी दलों का आंकड़ा काफी कम है।
आयोग का साफ कहना है कि फॉर्म-6 में प्रक्रियात्मक बदलाव सभी सदस्यों की सहमति और नियमों के तहत किए गए हैं, जबकि विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला करार देते हुए अपने आंदोलन पर अड़ा हुआ है।
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