काठमांडू। नेपाल में ऐतिहासिक 'जेन-जी आंदोलन' (Gen-Z Movement) का एक साल पूरा होने पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने आंदोलन के दौरान दर्ज सभी मुकदमों को वापस लेने का ऐलान किया था, लेकिन अब सरकार सिर्फ 300 मामलों को ही वापस लेने की तैयारी कर रही है। सरकार के इस कदम को जेन-जी युवा और प्रदर्शनकारी अपने साथ बड़ा 'धोखा' और समझौते की भावना का उल्लंघन बता रहे हैं।

नेपाली मीडिया हाउस 'ई-कांतिपुर' की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व केपी शर्मा ओली सरकार के कार्यकाल में 'मेटा बैन' (Meta Ban) के खिलाफ हुए इस विशाल आंदोलन के दौरान कुल 445 मामलों में 1,778 लोगों को आरोपी बनाया गया था।

बाबूराम रेगमी समिति की सिफारिश और विवाद की वजह

बालेन सरकार ने मुकदमों की वापसी की प्रक्रिया और नियम तय करने के लिए सेवानिवृत्त जज बाबूराम रेगमी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति की हालिया सिफारिशों के बाद ही यह विवाद गहराया है:

बिंदुविवरण
वापस होने वाले केस (~300)समिति का तर्क है कि केवल उन्हीं मुकदमों को खारिज किया जा सकता है जो सामान्य और शांतिपूर्ण प्रदर्शन से जुड़े थे।
गंभीर आरोपों वाले केस (1,400+)पुलिसकर्मियों पर हमले, हिंसा और सरकारी संपत्ति की लूटपाट से संबंधित मुकदमों को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया गया है।
अदालती कार्रवाई जारी (53 केस)53 आरोपियों के खिलाफ अदालती कार्यवाही शुरू हो चुकी है, जिसे सरकार न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में बता रही है।

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वादाखिलाफी पर भड़के जेन-जी नेता

केपी शर्मा ओली की बर्खास्तगी के बाद तत्कालीन सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ समझौता किया था कि आंदोलन से जुड़े सभी केस वापस लिए जाएंगे। इसी साल मई में बालेन सरकार के गृह मंत्री सूडान गुरुंग ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि आंदोलनकारियों पर दर्ज केस राजनीतिक कार्रवाई थे और इन्हें वापस लिया जाएगा।

लेकिन समिति की सिफारिश के बाद युवाओं में भारी आक्रोश है। आंदोलन की प्रमुख जेन-जी नेता सरिश्मा थापा ने कहा:

"पुलिस ने दुर्भावनावश एकतरफा तौर पर सभी प्रदर्शनकारियों पर आपराधिक आरोप ठोक दिए थे। हमें आश्चर्य है कि क्या जांच समिति ने केवल पुलिस के आरोपों को ही सच माना? यह फैसला सरकार और जेन-जी के बीच हुए समझौते की मूल भावना के खिलाफ है।"

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