प्रतिनिधि,चौपारण,हजारीबाग।प्रखण्ड में सुहागिनों द्वारा अपने पति की लंबी आयु के लिए की सावित्री वट वृक्ष की पूजा की। कहते हैं कि एक बार सावित्री ने अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिए यमराज से प्रार्थना की थी। उसी की याद में पत्नियां अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा कर पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती हैं।





वट अमावस्या का पर्व ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व पर सुहागिन स्त्रियां वट वृक्ष की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। इसे वट सावित्री व्रत भी कहते।सौभाग्य प्राप्ति का यह एक महत्वपूर्ण त्यौहार माना जाता है। वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है।वट वृक्ष को देव वृक्ष भी कहा गया है।कहते है कि देवी सावित्री भी इस वृक्ष में निवास करती हैं। इतिहास साक्षी है वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति सत्यवान को अपनी तपस्या के बल पर पुनः जीवित किया था। तब से यह व्रत वट सावित्री के नाम से जाना जाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियां अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वृक्ष की परिक्रमा करते समय इस पर 108 बार कच्चा सूत लपेटा जाता है और महिलाएं सावित्री सत्यवान की कथा सुनती हैं।





सावित्री की कथा सुनने से कहते है कि सुहागिनों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और पति के सारे संकट दूर होते हैं। नारद जी ने कहा कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह सच्चाई जानकर भी सावित्री सत्यवान से ही विवाह के लिए अड़ी रही। अंत में यमराज को भी सावित्री की पति को जीवन दान दिया और सावित्री की सास ससुर का खोया हुआ राजपाट वापस मिल गया । इसलिए इस दिन को सुहागिन अपनी पति की लंबी आयु के साथ एश्वर्य और वैभव प्रप्त होता हैं ।