कश्मीर घाटी में कृषि के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित करते हुए वैज्ञानिकों ने धान की दो नई उन्नत किस्में विकसित की हैं। 'शालीमार-4' और 'शालीमार-5' नामक ये किस्में न केवल देश की औसत उत्पादकता से लगभग ढाई गुना अधिक पैदावार देने में सक्षम हैं, बल्कि इनकी जल्दी पकने की खासियत से किसानों को एक ही खेत से साल में दूसरी फसल लेने का भी अवसर मिलेगा। घटती कृषि योग्य भूमि के दौर में यह तकनीक छोटे और सीमांत किसानों की आय दोगुनी करने में बेहद मददगार साबित होगी।
किसने और कहां विकसित कीं ये किस्में?
इन दोनों किस्मों को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी-कश्मीर (SKUAST-K) के अंतर्गत खुडवानी स्थित माउंटेन रिसर्च सेंटर फॉर फील्ड क्रॉप्स (MRCFC) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया है।
- शालीमार-4 (Shalimar-4): कश्मीर घाटी के मैदानी इलाकों में खेती के लिए अनुकूलित।
- शालीमार-5 (Shalimar-5): अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों (High Altitude) की प्रतिकूल जलवायु और ठंड को सहन करने के लिए तैयार।
मुख्य विशेषताएं और किसानों को होने वाले लाभ
- बंपर पैदावार (7.2 टन/हेक्टेयर): MRCFC के आंकड़ों के अनुसार, इन किस्मों से प्रति हेक्टेयर 7.2 टन तक पैदावार दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से 2.5 गुना अधिक है।
- ब्लास्ट रोग प्रतिरोधी (Disease Resistance): यह फफूंदजनित 'धान का झोंका' (Blast Disease) रोग के प्रति प्रतिरोधी हैं। इससे कीटनाशकों की खपत कम होगी और फसल सुरक्षा पर होने वाले अतिरिक्त खर्च की बचत होगी।
- जल्दी कटाई (Early Maturity): इन फसलों की कटाई 15 सितंबर से 25 सितंबर के बीच पूरी की जा सकती है। खेत जल्दी खाली होने से किसान समय पर सरसों, मटर या अन्य रबी फसलों की बुवाई कर सकेंगे।
- छोटी जोत वालों के लिए वरदान: 1996 से 2023 के बीच कश्मीर में लगभग 34,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि कम हुई है। ऐसे में सीमित भूमि से अधिकतम खाद्यान्न उत्पादन के लिए ये किस्में अति-उत्पादक सिद्ध होंगी।
धान के साथ-साथ पुआल (Straw) से अतिरिक्त कमाई
इन किस्मों का कुल बायोमास अनुपात 50:50 (आधा दाना और आधा पुआल) है, जिससे पुआल भी प्रचुर मात्रा में मिलता है:
- सेब पैकेजिंग: कश्मीर में सेब के बक्शों (Cartons) की पैकिंग और सुरक्षा (Cushioning) के लिए धान के पुआल की भारी मांग रहती है।
- सर्दियों में चारा: कड़ाके की ठंड (चिल्लई कलां) के दौरान पुआल मवेशियों के मुख्य भोजन/चारे के रूप में इस्तेमाल होता है।
निष्कर्ष: 'शालीमार-4' और 'शालीमार-5' किस्में उच्च उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, जल्दी कटाई और बायोमास उपयोगिता के कारण कश्मीर के धान किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।





