श्रीराजेश
कश्मीर की सुरम्य वादियों में जब बंदूकों का भीषण गर्जन कुछ क्षणों के लिए विश्राम लेता है, तो ऐसा आभास होता है मानो हिंसा की दीर्घ और अमावस-सी काली रात के पश्चात शांति की अरुणिमा ने क्षितिज पर दस्तक दी है। सड़कों पर पर्यटकों का कोलाहल, सेब के कुंजों में श्रम की थपकी और घाटी की आर्थिकी में लौटती स्पंदनशील गति इस विश्वास को अभिसिंचित करती है कि कश्मीर ने आतंक की उस भयावह विभीषिका को विस्मृति के गर्त में ढकेलना प्रारंभ कर दिया है। किंतु, आतंक की प्रकृति उस अदृश्य अंतर्धारा के सदृश है, जो धरातल पर निस्तब्ध किंतु पाताल में अत्यंत व्याकुल और उद्विग्न रहती है। जुलाई के तप्त वातावरण में कुलगाम की गलियों में दो निर्दोष प्रवासी श्रमिकों की नृशंस हत्या और अनंतनाग की वादियों में एक रक्षक का बलिदान—ये घटनाएं उसी दबी हुई ज्वाला के पुनः प्रज्वलित होने का संकेत हैं।
यह केवल रक्तपात की छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, अपितु यह उस कुटिल रणनीति का पुनरागमन है, जिसे युद्ध-कौशल की भाषा में ‘सॉफ्ट-टारगेट टेररिज्म’ कहा जाता है। जब आतंकवादी सुरक्षा बलों की अभेद्य दीवार से सीधी मुठभेड़ में अपनी पराजय स्वीकार कर लेते हैं और उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं ध्वस्त होने लगती हैं, तब वे उन निहत्थे हाथों को अपना निशाना बनाते हैं, जिन्होंने कभी हथियार का स्पर्श तक नहीं किया। आतंक अब मोर्चे के रणक्षेत्र से हटकर मनोविज्ञान के अतल गलियारों में युद्ध लड़ रहा है। अप्रैल 2025 का वह रक्तरंजित पहलगाम अध्याय इसी घृणित सोच का एक वीभत्स प्रलेख था। पर्यटकों पर किया गया वह प्रहार केवल नागरिकों की हत्या नहीं थी, अपितु कश्मीर की आर्थिकी की उन धमनियों को अवरुद्ध करने का कुचक्र था, जो इस घाटी के पांच लाख परिवारों के जीवन का आधार हैं। पर्यटन यहां की आर्थिकी का सात प्रतिशत योगदान ही नहीं देता, बल्कि यह शेष भारत के साथ कश्मीर के अटूट भावनात्मक सेतु का निर्माण भी करता है। आतंक का एक विस्फोट केवल देह को क्षत-विक्षत नहीं करता, वह निवेश और विश्वास की कोमल कलियों को भी कुचल देता है।
कुलगाम की इस विडंबना का एक आर्थिक परिप्रेक्ष्य और भी गहन है। जब कश्मीर की माटी में सेब की तुड़ाई और संचयन का महोत्सव होता है, तब पांच लाख प्रवासी श्रमिकों का श्रम उस समृद्धि के ताने-बाने को बुनता है। किसी गैर-स्थानीय श्रमिक की छाती को छलनी करना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, अपितु उस राष्ट्रीय एकात्मता पर प्रहार है, जिसमें कश्मीर की संपन्नता और शेष भारत का पुरुषार्थ परस्पर आलिंगनबद्ध हैं। इसके मूल में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का वह कल्पित और विषैला भय है, जिसे अनुच्छेद 370 के अवसान के पश्चात सीमा-पार के संचालकों ने बड़ी चतुराई से प्रचारित किया है। जो श्रमिक अपने पसीने से कश्मीर के वैभव को सींचता है, उसे ‘बाहरी’ कहकर पराया बना देना इसी मनोवैज्ञानिक समर का हिस्सा है।
किंतु, आतंक की इस परिवर्तित कार्यशैली के नेपथ्य में उसकी स्वयं की पराजय की व्यथा भी अनुगुंजित है। 2019 के उपरांत पत्थरबाजी का वह उन्माद और स्थानीय युवकों का हथियार उठाना अब इतिहास की धूल बन चुका है। 2020 में जहाँ 166 युवक पथभ्रष्ट हुए थे, वहीं 2025 में यह संख्या केवल एक तक सिमट गई। आज घाटी में सक्रिय बंदूकें अधिकांशतः सीमा-पार की आयातित मौतें हैं। वह सामाजिक उर्वरता, जो कभी आतंक की फसल उगाती थी, अब बंजर हो चुकी है। इसीलिए, अब आतंक ने अपना चोला बदल लिया है। घने अरण्यों में छिपे अपराधी अब मोबाइल की काली स्क्रीन और एन्क्रिप्टेड तंत्र के माध्यम से ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का नया मॉडल संचालित कर रहे हैं। यहाँ बंदूक थमाने से पूर्व डिजिटल कट्टरपंथ का हलाहल पिलाया जाता है, जिससे सामान्य नागरिक भी अनजाने में हिंसा का उपकरण बन जाता है।
फिर भी, प्रश्न यह नहीं कि क्या कश्मीर पुनः उस अंधकारमयी सुरंग में विलीन हो रहा है? उत्तर कदापि नहीं है। 2023 से 2025 के मध्य 7.81 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर इस बात का साक्ष्य है कि शांति का पौधा अब वटवृक्ष बन रहा है। 2026 के प्रथम छह मासों में हुई आतंकी मृत्युओं के आंकड़े बताते हैं कि संत्रास का सामाजिक प्रभाव निरंतर सिकुड़ रहा है। किंतु जुलाई की ये घटनाएं एक गंभीर चेतावनी हैं कि शांति की यह उपलब्धि अभी भी कालिदास की उपमा जैसी कोमल और संवेदनशील है।
कश्मीर की विजय उस दिन पूर्ण होगी, जब उसकी घाटियाँ बंदूक की प्रतिध्वनि नहीं, अपितु जीवन का मंगल राग पहचानेंगी। आतंक का अंतिम लक्ष्य केवल देह का अवसान नहीं, अपितु मनुष्य के भीतर से आगामी कल के प्रति अटूट विश्वास का वध करना है। और कश्मीर का दृढ़ संकल्प उस विश्वास की रक्षा करने में ही निहित है।





