रांची: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर केंद्र सरकार और झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया है। राज्यों के खनिज पर सेस (Cess) वसूलने के अधिकार को समाप्त करने वाले इस केंद्रीय कानून के विरोध में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने शनिवार को राज्यभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन और धरने की घोषणा की है।

'जल, जंगल, जमीन' का नारा और प्रखंड स्तर पर आंदोलन

झामुमो ने संसद से पारित इस नए कानून को झारखंड की जनता और उसके अधिकारों पर सीधा कुठाराघात करार दिया है।

  • राज्यव्यापी प्रदर्शन: शनिवार को राज्य के सभी प्रखंड (Block) मुख्यालयों में झामुमो सांसदों और विधायकों के नेतृत्व में जोरदार धरना-प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।
  • स्थगित आंदोलन की नई तारीख: पहले यह आंदोलन 7 सितंबर को प्रस्तावित था, लेकिन नगर विकास एवं उच्च शिक्षा मंत्री सुदिव्य सोनू के आकस्मिक निधन के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था।
  • पारंपरिक मुद्दे की वापसी: झामुमो कार्यकर्ता एक बार फिर झारखंड आंदोलन के मूल आधार—'जल, जंगल और जमीन पर अधिकार'—के नारे के साथ जनता के बीच पहुंच रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश और राजस्व का बड़ा नुकसान

झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता कुणाल षाड़ंगी ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना के खिलाफ है।

  • न्यायिक आदेश को पलटने का आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि संघीय व्यवस्था के तहत राज्यों को खनिजों पर सेस लगाने का संवैधानिक अधिकार है। झामुमो का आरोप है कि केंद्र सरकार ने बिना राज्यों से राय-मशविरा किए या संसद में व्यापक बहस के, महज संख्या बल के आधार पर इस अधिकार को छीन लिया।
  • राजस्व पर सीधा असर: सेस के माध्यम से पिछले वित्तीय वर्ष में झारखंड को ₹7,000 करोड़ का राजस्व मिला था, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में यह अनुमान ₹13,000 करोड़ का था।
  • बकाया राशि का मुद्दा: प्रवक्ता के अनुसार, इस मद में भारत सरकार पर पूर्व के वर्षों का लगभग ₹1.36 लाख करोड़ बकाया है, जिसे देने से केंद्र पीछे हट रहा है।

कानूनी लड़ाई और आर-पार की तैयारी

केंद्रीय कानून में रोक के बावजूद हेमंत सोरेन सरकार ने राज्य में फिलहाल खनिज पर सेस की वसूली जारी रखने का फैसला किया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर केंद्र के आगे झुकने को तैयार नहीं है। जानकारों का मानना है कि यदि यह गतिरोध इसी तरह बना रहा, तो मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।