भारत का निर्वाचन आयोग इन दिनों एक बड़े आंतरिक और राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के नवीनीकरण की प्रक्रियाओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एक तरफ विपक्षी दल 'वोट चोरी' और मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने के आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ मीडिया रिपोर्ट्स में आयोग के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों के बीच नीतिगत मतभेदों का दावा किया गया है। यद्यपि चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे बहु-सदस्यीय संस्था की सामान्य प्रशासनिक चर्चा का हिस्सा बताया है, फिर भी इस पूरे मामले ने गंभीर बहस छेड़ दी है।
विवाद की मुख्य वजह: SIR और फॉर्म-6 में नए बदलाव
विवाद की शुरुआत जून 2025 में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई 'स्पेशल इंटेंसिवrevision' (SIR) प्रक्रिया से हुई, जिसका उद्देश्य मतदाता सूचियों को अपडेट करना था। इस प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की बात सामने आई, जिस पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विवाद फॉर्म-6 को लेकर सामने आया है, जो नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है।
- फॉर्म-6 का नियम: नए नियम के तहत आवेदकों के लिए यह जानकारी देना अनिवार्य किया गया कि क्या उनके माता-पिता या पूर्वजों के नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में शामिल थे। आलोचकों का तर्क है कि दस्तावेजों की कमी और तकनीकी पेचीदगियों के कारण आम नागरिकों और युवाओं के लिए नाम दर्ज कराना कठिन हो रहा है।
- सॉफ्टवेयर एक्सेस की सीमाएं: स्थानीय स्तर पर चुनाव सूची तैयार करने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ERO/SDM) के ECINet सॉफ्टवेयर एक्सेस को सीमित करने पर भी सवाल उठाए गए।
- तकनीकी खामियां और कानूनी प्रक्रियाएं: गोवा में अदालती निर्देशों के बावजूद कुछ पात्र मतदाताओं के नाम सॉफ्टवेयर में दर्ज न हो पाने और पश्चिम बंगाल में डेटा समीक्षा से जुड़े मामलों ने इस तकनीकी प्रक्रिया को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
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इस घटनाक्रम के प्रमुख प्रशासनिक किरदार
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में वे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो निर्णय लेने की प्रक्रिया और आयोग के संचालन से जुड़े हैं:
- ज्ञानेश कुमार (मुख्य चुनाव आयुक्त): 1988 बैच (केरल कैडर) के पूर्व आईएएस अधिकारी, जिनके नेतृत्व में आयोग वर्तमान प्रक्रियाएं संचालित कर रहा है। विपक्ष उनके फैसलों की आलोचना करते हुए पद छोड़ने की मांग कर रहा है, जबकि आयोग का रुख है कि सभी निर्णय नियमानुसार लिए गए हैं।
- सुखबीर सिंह संधू (चुनाव आयुक्त): 1988 बैच (उत्तराखंड कैडर) के पूर्व आईएएस अधिकारी, जिन्होंने प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सॉफ्टवेयर एक्सेस से जुड़े विषयों पर अपनी प्रशासनिक राय और आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
- विवेक जोशी (चुनाव आयुक्त): 1989 बैच (हरियाणा कैडर) के पूर्व आईएएस अधिकारी, जिन्होंने फॉर्म-6 के नियमों में बदलाव की वैधानिक प्रक्रियाओं को लेकर अपने विचार व्यक्त किए थे।
- सीमा खन्ना (डीजी, आईटी): चुनाव आयोग में सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक, जिनके मार्गदर्शन में ECINet प्लेटफॉर्म को विकसित और संचालित किया जा रहा है।
- टी. वी. सोमनाथन (कैबिनेट सचिव): देश के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी, जिनका संदर्भ आयोग के आंतरिक पत्राचार और अंतर-विभागीय समन्वय के दौरान सामने आया।
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क्या है फॉर्म-6 और क्यों बना विवाद का कारण?
फॉर्म-6 भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा जारी वह आधिकारिक पत्र है जिसके माध्यम से 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करते हैं। इसे राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NVSP), ECINet ऐप या संबंधित क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के माध्यम से जमा किया जा सकता है।
विवाद का मुख्य बिंदु: नवीनतम संशोधनों के तहत आवेदकों के लिए अपने परिजनों का ऐतिहासिक वोटर डेटा देना अनिवार्य किया गया है। जानकारों का मानना है कि दूरदराज के क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए पुराने रिकॉर्ड जुटाना एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती बन गया है।
आगे की राह
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व सुरक्षा संवैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित होती है, और उन्हें हटाने की प्रक्रिया संसद के माध्यम से ही संभव है। फिलहाल यह मामला न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक चर्चा के दायरे में है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची की सटीकता और पारदर्शिता दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग इन तकनीकी व प्रशासनिक चिंताओं का समाधान किस प्रकार करता है ताकि आम जनता का विश्वास इस संवैधानिक संस्था पर पूरी तरह कायम रहे।





