देश के सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद औद्योगिक घरानों में से एक टाटा समूह इस समय एक अभूतपूर्व अंदरूनी खींचतान के दौर से गुजर रहा है। टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस और उसकी सबसे बड़ी शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के बीच की खाई अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों तक पहुँच चुकी है।
इस हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट जंग को जिस बात ने सबसे ज्यादा सुर्खियों में ला दिया है, वह है देश के दो सबसे दिग्गज और महंगे वकीलों की एंट्री। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी मैदान में हैं, तो वहीं टाटा संस का पक्ष रखने के लिए सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे खड़े हैं। विडंबना यह है कि साल 2016 के बहुचर्चित साइरस मिस्त्री विवाद में यही दोनों दिग्गज एक ही तरफ से टाटा समूह की ढाल बने थे। अब वही दो 'रक्षक' आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे की दलीलों को चुनौती देंगे।
क्या है पूरा विवाद? कुर्सी, आईपीओ और वीटो की जंग
टाटा समूह की संरचना को समझें तो टाटा संस समूह की मुख्य निवेश व होल्डिंग कंपनी है, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स की 66% हिस्सेदारी है। इसका सीधा मतलब यह है कि टाटा संस के किसी भी बड़े या नीतिगत फैसले में टाटा ट्रस्ट्स की सहमति अनिवार्य है। वर्तमान में रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स की कमान संभाल रहे हैं, जबकि एन. चंद्रशेखरन टाटा संस के चेयरमैन पद पर काबिज हैं।
विवाद की चिंगारी 17 सितंबर को तब सुलगी, जब एक बैठक के दौरान एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को 5 साल के लिए और बढ़ाने का फैसला लिया गया—जबकि रिपोर्ट्स के अनुसार, चंद्रशेखरन स्वयं पद छोड़ने की इच्छा जता चुके थे।
वोटों का विभाजन और 'आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन'
इस फैसले को लेकर ट्रस्ट के भीतर ही दरार साफ नजर आई:
- वोटिंग में फूट: ट्रस्ट की बैठक में चंद्रशेखरन को बनाए रखने को लेकर दो प्रमुख सदस्यों—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन के बीच सहमति नहीं बन सकी और वोट बंट गए।
- निर्णायक वोट: इसके बाद एक अन्य ट्रस्टी हरीश मनवानी ने चंद्रशेखरन के पक्ष में मतदान किया, जिससे कार्यकाल विस्तार पर मुहर लग गई।
- नोएल टाटा का विरोध: नोएल टाटा ने 'आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन' (Articles of Association) के नियमों का हवाला देते हुए इस फैसले का कड़ा विरोध किया है।
इसके अलावा, टाटा संस की संभावित स्टॉक मार्केट लिस्टिंग (IPO) को लेकर भी दोनों पक्षों में गहरा मतभेद है। हरीश साल्वे के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स नहीं चाहता कि टाटा संस की लिस्टिंग हो और इस संबंध में वेणु श्रीनिवासन को औपचारिक पत्र भी भेजा गया था।
दोनों पक्ष के दिग्गजों के क्या हैं तर्क?
वकीलों की नियुक्ति के साथ ही दोनों खेमों से तीखी बयानबाजी शुरू हो चुकी है:
डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (टाटा ट्रस्ट्स):
"टाटा संस विवाद के दौरान मुझे रतन टाटा जी के साथ करीब से काम करने और टाटा ग्रुप के मूल्यों को गहराई से समझने का अवसर मिला था। इस पूरे विवाद को शांतिपूर्ण और सही तरीके से न सुलझा पाना बेहद दुखद है। कुछ लोग नियमों के खिलाफ जाकर काम कर रहे हैं।"
हरीश साल्वे (टाटा संस):
"यह पूरी तरह से एक अंदरूनी मामला है। टाटा संस को लेकर अब तक जो भी प्रशासनिक फैसले लिए गए हैं, वे पूरी तरह से कानूनी रूप से सही और वैधानिक हैं।"
दिग्गजों का पुराना साथ: 2016 का साइरस मिस्त्री केस
साल 2016 में जब साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया था, तब मिस्त्री इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे। उस समय टाटा संस की साख बचाने के लिए हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी ने एक साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ी थी।
2021 में आए सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने साल्वे और सिंघवी की दलीलों को सही मानते हुए कहा था कि निवेशकों के हित में टाटा संस का निर्णय उचित था। यही वजह है कि दोनों वकीलों को टाटा समूह की अंदरूनी कार्यप्रणाली, नियमों और संवेदनशील दस्तावेजों की बारीक समझ है।
कानूनी महारथी: साल्वे बनाम सिंघवी
| विवरण | डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी | हरीश साल्वे |
| जन्म स्थान | जोधपुर, राजस्थान | धुले, महाराष्ट्र |
| उम्र / अनुभव | 34 की उम्र में SC के सीनियर एडवोकेट; 37 में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल | 65 वर्ष; भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल व सीए (CA) |
| शिक्षा | कैम्ब्रिज और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी | नागपुर विश्वविद्यालय (कानून व सीए) |
| विशेषज्ञता | संविधान, कॉरपोरेट लॉ, क्रिमिनल लॉ व पब्लिक लॉ | कॉरपोरेट कानून, कराधान (Taxation) व कमर्शियल लॉ |
| अनुमानित फीस | ₹12 लाख से ₹25 लाख (प्रति सुनवाई) | ₹15 लाख तक (प्रति सुनवाई) |
| SC में रिकॉर्ड (2021-2026) | 2,043 से अधिक केसों में उपस्थिति | 337 केस (884 सुनवाइयों में भाग लिया) |
(स्रोत: Siddh AI द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों पर आधारित रिसर्च रिपोर्ट)
आगे क्या?
भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने का यह विवाद केवल दो व्यक्तियों या पदों की जंग नहीं है, बल्कि यह टाटा ट्रस्ट्स के नैतिक नियंत्रण और टाटा संस के कॉरपोरेट संचालन के बीच का शक्ति-संतुलन है। जब सुप्रीम कोर्ट में देश के दो सबसे तीक्ष्ण दिमाग आमने-सामने होंगे, तो अदालत की नजर न केवल कानूनी नियमों पर होगी, बल्कि इस बात पर भी होगी कि टाटा समूह के ऐतिहासिक मूल्यों की रक्षा कैसे की जाए।





