नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने 903 से अधिक लोगों की जान ले ली है। इस भीषण आपदा के बाद अब नेपाल के निचले इलाकों, विशेषकर चितवन जिले में मृतकों की पहचान करने और उनके अंतिम संस्कार को लेकर एक नया और गंभीर संकट खड़ा हो गया है। फॉरेंसिक सुविधाओं की भारी कमी, शवदाह गृहों की सीमित क्षमता और स्वास्थ्य संबंधी खतरों को देखते हुए प्रशासन ने शवों को अस्थायी रूप से दफनाने का फैसला लिया है, जिसे लेकर देश भर में तीखी बहस छिड़ गई है।

चितवन में भोटेकोशी नदी के रास्ते बहकर पहुंचे लगभग 250 से अधिक शवों की पहचान होना अभी बाकी है। सड़ते शवों के कारण बीमारियां फैलने की आशंका को देखते हुए अधिकारियों ने शनिवार और रविवार को सौ से अधिक शवों को जंगलों में खोदे गए गड्ढों में अस्थायी तौर पर दफन कर दिया।

प्रशासन की व्यवस्था और दफनाने की मुख्य वजहें:

  • डीएनए और पहचान चिह्न सुरक्षित: पुलिस निरीक्षक अनिल थापा के अनुसार, प्रत्येक शव का डीएनए नमूना, चेहरे के विशेष निशानों की तस्वीरें और अन्य जानकारी दर्ज की जा रही है। हर शव को एक संदर्भ संख्या (Reference Number) दी गई है ताकि बाद में परिजन पहचान कर शव प्राप्त कर सकें।
  • सड़न और बीमारी का खतरा: पानी में चार दिनों तक डूबे रहने के कारण शवों में सड़न शुरू हो चुकी थी। अधिक नमी और गर्मी के चलते स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने महामारी फैलने की चेतावनी दी थी।
  • संसाधनों की भारी कमी: चितवन जिले में फॉरेंसिक सुविधाओं और शवगृह (Mortuary) की क्षमता बेहद सीमित है। इसके अलावा, काठमांडू-चितवन मुख्य राजमार्ग पर नए भूस्खलन के कारण यातायात ठप्प होने से राहत कार्य और जटिल हो गए हैं।

धार्मिक परंपराओं की अनदेखी और जनता में भारी नाराजगी:

प्रशासन के इस कदम का पीड़ित परिवारों और कई सार्वजनिक हस्तियों ने कड़ा विरोध किया है। बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाले नेपाल में पारंपरिक रूप से मृतकों का दाह-संस्कार नदी किनारे किया जाता है।

  • परिजनों का दर्द: लापता लोगों की तलाश कर रही रूबी चौधरी ने कहा कि परिवारों की सहमति के बिना शवों को दफनाया जाना अनुचित है और मृतकों को अंतिम सम्मान मिलना चाहिए।
  • पूर्व पीएम का सवाल: पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि खोज व बचाव अभियान पूरा होने और परिजनों से परामर्श किए बिना यह कदम जल्दबाजी में उठाया गया। उन्होंने कहा कि प्रशासन को कोल्ड स्टोरेज या अस्थायी मुर्दाघर जैसी आपातकालीन व्यवस्थाएं करनी चाहिए थीं।

प्रशासन का स्पष्टीकरण:

पुलिस प्रशासन ने साफ किया है कि यह दफन प्रक्रिया केवल एक अस्थायी व्यवस्था है, न कि स्थायी। जैसे ही परिजन डीएनए या अन्य निशानों के आधार पर पहचान की पुष्टि करेंगे, शवों को उनके हवाले कर दिया जाएगा ताकि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार कर सकें।