पटना / नई दिल्ली: बिहार में 1 अप्रैल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी के 10 साल पूरे होने के बाद अब इस कानून के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। देश के प्रतिष्ठित आर्थिक थिंक टैंक 'नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च' (NCAER) के शोधकर्ताओं ने अपने हालिया रिसर्च पेपर ('इंडिया पॉलिसी फोरम' में प्रस्तुत) में दावा किया है कि शराबबंदी अपने प्राथमिक सामाजिक उद्देश्यों को हासिल करने में नाकाम रही है। शोधकर्ताओं ने राज्य सरकार को पूर्ण प्रतिबंध हटाकर सख्त सरकारी नियंत्रण में “विनियमित बिक्री” (Regulated Sales) शुरू करने की सलाह दी है।
क्यों नाकाम रही शराबबंदी नीति? NCAER के 5 प्रमुख बिंदु
- महिला सुरक्षा के लक्ष्य में विफलता: तत्कालीन नीतीश सरकार का मुख्य तर्क था कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अपराध घटेंगे। हालांकि, सरकारी आंकड़ों और विश्लेषण के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ रिपोर्ट किए गए अपराधों में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई, बल्कि कुछ मामलों में वृद्धि दर्ज हुई।
- अवैध माफिया और सिंथेटिक ड्रग्स का उभार: शराब पर पूरी तरह रोक लगाने से इसकी मांग खत्म नहीं हुई, बल्कि यह काले बाजार में शिफ्ट हो गई। इससे राज्य में एक समानांतर अवैध शराब माफिया खड़ा हो गया। वहीं, युवाओं में सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियों और कफ सिरप का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जो स्वास्थ्य के लिए अधिक घातक साबित हो रहा है।
- राजस्व को भारी झटका: शराबबंदी से पहले उत्पाद शुल्क (Excise Duty) राज्य के अपने राजस्व का लगभग 14% हिस्सा था। प्रतिबंध के कारण सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, जिससे बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विकास कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
- प्रशासनिक खर्च और तस्करी: शराबबंदी को लागू करने और तस्करी रोकने में पुलिस व प्रशासन का भारी बजट और कीमती समय खर्च हो रहा है।
- राजस्व बढ़ाने की संभावना: यदि शराबबंदी हटाकर विनियमित बिक्री लागू की जाए, तो राज्य के अपने राजस्व में 14% से 15% तक की सीधी बढ़ोतरी हो सकती है।
'रेगुलेटेड सेल्स' (विनियमित बिक्री) मॉडल कैसे बनेगा समाधान?
NCAER के विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि बिहार सरकार को पूर्ण प्रतिबंध के स्थान पर एक ऐसा मॉडल अपनाना चाहिए जहां सरकार की केंद्रीय और सख्त निगरानी हो:
- सीमित दुकानें और डिजिटल ट्रैकिंग: दुकानों की संख्या सीमित रखी जाए और आपूर्ति की डिजिटल निगरानी हो ताकि अवैध व्यापार समाप्त हो।
- उच्च कर (High Taxes): शराब पर भारी कर लगाकर खपत को नियंत्रित किया जाए और इससे प्राप्त राजस्व को विकास योजनाओं में लगाया जाए।
- अपराध नियंत्रण पर ध्यान: प्रशासनिक अमले को शराबबंदी की चेकिंग से मुक्त कर राज्य की कानून-व्यवस्था और अन्य गंभीर अपराधों को रोकने में लगाया जाए।
2047 तक 'विकसित बिहार' का लक्ष्य
NCAER की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि देश के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले और सबसे गरीब राज्यों में शामिल बिहार की भूमिका 2047 तक 'विकसित भारत' के सपने को पूरा करने में बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण, निजी निवेश और महिला सशक्तिकरण जैसे प्राथमिक क्षेत्रों के विकास के लिए पूर्ण प्रतिबंध के बजाय कड़े सरकारी नियमों और सामाजिक जागरूकता का रास्ता अपनाना अधिक व्यावहारिक होगा।





