रायपुर।

गोंड-गांड़ा, ओड़िया और विविध जनजातीय समुदायों की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर तथा प्रमुख कृषि लोकपर्व ‘नुआखाई’ को देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान राष्ट्रपति भवन में गरिमामय स्थान दिए जाने पर राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज ने हर्ष व्यक्त किया है। समाज ने इस ऐतिहासिक पहल के लिए भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का हृदय से आभार प्रकट किया है।

सांस्कृतिक समावेश और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक

राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज के संस्थापक अधिवक्ता भगवानू नायक ने इस अवसर पर कहा कि यह सम्मान केवल एक त्योहार भर का नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन मूल्यों को सहेजने वाले करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक जड़ों की मान्यता है।

  • विविधता में एकता: राष्ट्रपति भवन भारत के लोकतंत्र, संविधान और विविधता का राष्ट्रीय प्रतीक है। वहां लोक-संस्कृति को मंच मिलना देश में सांस्कृतिक समावेश का बेहद सकारात्मक संदेश देता है।
  • वास्तविक सांस्कृतिक शक्ति: भारत की असली सांस्कृतिक धरोहर केवल बड़े नगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों, खेतों और जंगलों में बसने वाले उन समुदायों में रची-बसी है जिन्होंने हर परिस्थिति में अपनी परंपराओं को सहेजे रखा।

वंचित वर्गों में बढ़ेगा गौरव और आत्मविश्वास

भगवानू नायक ने रेखांकित किया कि राष्ट्रपति भवन द्वारा पिछले कुछ वर्षों में आम नागरिकों, विशेषकर पिछड़े व वंचित समुदायों को देश की मुख्यधारा और विकास यात्रा से जोड़ने के अभूतपूर्व प्रयास किए गए हैं। नुआखाई को राष्ट्रीय स्तर पर मिली यह पहचान इसी प्रगतिशील दृष्टिकोण का प्रतिफल है। इससे आदिवासी व पिछड़े वर्गों की युवा पीढ़ी में अपनी जड़ों के प्रति गर्व और आत्मविश्वास सुदृढ़ होगा।

गांड़ा समाज की लोककलाओं के लिए भी जागी उम्मीद

इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जताते हुए राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज ने आशा व्यक्त की है कि भविष्य में भी गांड़ा समाज के लोकपर्वों, समृद्ध लोककलाओं, पारंपरिक लोकवाद्यों और अनूठी सांस्कृतिक विरासत को इसी प्रकार राष्ट्रीय पटल पर सम्मान प्राप्त होगा।