सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने देश की चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूचियों से लोगों को अवैध रूप से बाहर करने और चुनाव आयुक्तों की मौजूदा नियुक्ति प्रणाली पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन विसंगतियों के कारण देश का लोकतंत्र बहुत बड़े खतरे में है।

जस्टिस नरीमन ने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय इस नाजुक मोड़ पर आगे आएगा और व्यवस्था में व्याप्त इन कमियों को दूर करेगा।

'बंगाल में 90 लाख लोग मताधिकार से हुए वंचित'

राजकोट के राजकुमार कॉलेज में 'संविधान और आम आदमी' विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस नरीमन ने पश्चिम बंगाल चुनाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बंगाल में लगभग 90 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया, जो एक अत्यंत आश्चर्यजनक और परेशान करने वाला आंकड़ा है।

न्यायमूर्ति नरीमन ने बताया:

"मताधिकार से वंचित हुए लोगों में से लगभग 22 लाख ने अपील दायर की। साधन या न्याय तक पहुंच न होने के कारण बाकी लोग अपील नहीं कर सके। सुनवाई की गई लगभग 1 लाख अपीलों में से करीब 93% मामलों का फैसला मतदाताओं के पक्ष में हुआ। इसका सीधा मतलब यह है कि उन्हें पूरी तरह से अवैध रूप से सूची से हटाया गया था।"

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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल

जस्टिस नरीमन ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में केंद्र सरकार के एकतरफा प्रभाव को लोकतंत्र के लिए पहला सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा:

  • तत्कालीन सरकार के हाथों में नियंत्रण: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह से तत्कालीन सरकार के नियंत्रण में है, जिससे आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
  • संविधान पीठ से तत्काल फैसले की उम्मीद: जितनी जल्दी हो सके संविधान पीठ को इस पर निर्णय लेना चाहिए। नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके नामित व्यक्ति का होना अनिवार्य है, ताकि योग्य और निष्पक्ष लोगों का चयन हो सके।

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सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की गुहार

जस्टिस नरीमन ने विश्वास व्यक्त किया कि सुप्रीम कोर्ट जल्द से जल्द इस दिशा में ठोस कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि देश में ऐसा चुनाव आयोग नहीं हो सकता जो इस तरह काम करे या गड़बड़ियां होने दे। आम नागरिक को परेशान करके राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिशें लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती हैं।

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