जलज श्रीवास्तव
यह विवाद पूरी तरह अनावश्यक था। ऐसे समय में जब राहुल गांधी पिछले कुछ समय से नरेंद्र मोदी के मुकाबले एक बेहतर राजनीतिक रणनीति के साथ आगे बढ़ते दिख रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा चुने गए वैचारिक धरातल पर घिसटते चले जाना एक आत्मघाती कदम जैसा है। इस पूरे प्रकरण के कुप्रबंधन के कारण कांग्रेस एक बार फिर भाजपा के उसी पुराने जाल में फंस गई, जहाँ एजेंडा भाजपा तय करती है और विपक्षी दल अपनी पूरी ऊर्जा केवल स्पष्टीकरण देने में खर्च कर देते हैं।
राष्ट्रवाद का समर्पण: व्याख्या बनाम प्रतिक्रिया
देश की मुख्य विपक्षी पार्टी, जिसके पास उठाने के लिए ज्वलंत मुद्दों की एक लंबी सूची है, उसे अपना बहुमूल्य समय इस बहस में नहीं गंवाना चाहिए कि राष्ट्रगीत के छह पद गाए जाएं या दो। भाजपा को यह कतई आवश्यक नहीं है कि कांग्रेस उसके एजेंडे से सहमत हो; उसे बस इतना चाहिए कि कांग्रेस उसके द्वारा तय किए गए विषयों पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दे। जैसे ही ऐसा होता है, भाजपा आधी लड़ाई जीत लेती है। यह उन कई तरीकों में से एक है जिनसे कांग्रेस ने राष्ट्रवाद का एक बड़ा प्रतीकात्मक मैदान भाजपा के लिए खाली छोड़ दिया है। कांग्रेस एक सरल संदेश दे सकती थी—वह इस गीत को अपना मान सकती थी और यह संकेत दे सकती थी कि वह देशभक्ति को पदों (स्टैंजा) के आधार पर नहीं तौलती।
1937 का संदर्भ और आज की हकीकत
1937 में कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) द्वारा केवल पहले दो पदों को गाने के निर्णय के पीछे एक स्पष्ट ऐतिहासिक संदर्भ था। उस समय पार्टी को लगा था कि बाद के पदों में ऐसी धार्मिक शब्दावली और बिम्ब (इमेजरी) हैं, जिनसे अन्य धार्मिक समूहों को असुविधा हो सकती है। अतः राष्ट्रीय सम्मेलनों में केवल प्रथम दो पदों के गायन की परंपरा शुरू हुई।
लेकिन लगभग एक सदी बीत जाने के बाद, क्या आज भी यह धर्मनिरपेक्षता (सेकुलरिज्म) की परीक्षा होनी चाहिए? क्या किसी ऐसे काव्य का गान, जिसमें एक हिंदू देवी का उल्लेख हो, एक नागरिक को कम धर्मनिरपेक्ष बना देता है? आखिर जिस देश को हम 'भारत माता' कहते हैं, वहां मां दुर्गा का आह्वान धार्मिक निष्ठा का कार्य कैसे बन गया? एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में किसी को भी—चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम—कोई भी गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यह कहना कि इस गीत को पूरा गाना किसी को धर्मनिरपेक्ष परंपरा से बाहर कर देता है, एक बिल्कुल अलग और कमजोर तर्क है।
यह वैचारिक पहरेदारी (गेटकीपिंग) एक तरह से भारतीय मुसलमानों के प्रति भी अपमानजनक है, क्योंकि यह मान लेती है कि वे इतने कमजोर हैं कि राष्ट्रगीत में एक हिंदू देवी का जिक्र मात्र उन्हें अलग-थलग महसूस कराएगा। यह धर्मनिरपेक्षता के हमारे संस्करण को इतना डरपोक बना देता है कि वह अपनी समावेशिता साबित करने के लिए अपनी ही सांस्कृतिक विरासत के अंगों को काटने की मांग करने लगता है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि वह भाजपा और हिंदू दक्षिणपंथ को 'सेकुलर लेबल' चिपकाने की बेचैनी से नहीं हरा सकती; वह केवल भारतीय संस्कृति पर अपने अधिकार को पुनः प्राप्त करके ही जीत सकती है।
बंकिम चंद्र: अपने समय के आधुनिक रचनाकार
इतिहास के हर महान व्यक्तित्व की तरह, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय भी अपने समय की उपज थे। उनके अपने कई सिद्धांत थे, जो शायद आज उन लोगों को भी रास न आएं जो खुद को इस गीत के सबसे बड़े रक्षक मानते हैं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ', जिससे 'वंदे मातरम' लिया गया है, उस तरह समाप्त नहीं होता जैसा कई "राष्ट्रवादी" विश्वास करना चाहते हैं। उपन्यास के अंत में अंग्रेजी शासन को एक 'दैवीय व्यवस्था' के रूप में देखा गया है।
बंकिम के अनुवादक आलो शोम के अनुसार, बंकिम चंद्र ने आनंदमठ पर एक पाठक के विचार को "बुद्धिमानीपूर्ण आकलन" के रूप में स्वीकार किया था, जिसमें कहा गया था कि अंग्रेज भौतिक विज्ञान के प्रकांड पंडित हैं और वे अच्छे शिक्षक भी हैं, इसलिए उन्हें राजा बनने दें। अंग्रेजी शिक्षा हमें भौतिक ज्ञान देगी जिससे हम अपनी आंतरिक प्रकृति की समस्याओं को हल कर सकेंगे। क्या इससे बंकिम "राष्ट्रविरोधी" हो जाते हैं? नहीं, वे केवल उस समय की संस्कृति की भावनाओं को प्रतिबिंबित कर रहे थे, जो मानती थी कि बंगाल में ब्रिटिश सरकार एक 'अनिवार्य बुराई' है।
राष्ट्र का देवीकरण: एक आधुनिक परिकल्पना
अब सवाल आता है बाद के पदों के "हिंदूकरण" का। यहाँ हमें यह समझना होगा कि बंकिम को देश को एक 'मां' और फिर 'देवी' के रूप में बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी। बंकिम चंद्र ने राष्ट्र के आधुनिक विचार को पश्चिम से समझा था और फिर उस विचार को एक भारतीय (और स्वाभाविक रूप से हिंदू) सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया। राष्ट्र उनके लिए केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि वह एक मां बन गया और उसकी जमीन एक शरीर। मां के सामने नागरिक एक 'बच्चा' बन जाता है, जिससे एक गहरा भावनात्मक संबंध स्थापित होता है।
जैसा कि मीनाक्षी मुखर्जी ने अपने एक निबंध में उल्लेख किया है: "यह पहली बार था जब शक्ति की हिंदू अवधारणा को एक राजनीतिक इकाई के रूप में देश के विचार के साथ जोड़ा गया था, और इस संलयन (फ्यूजन) की प्रतीकात्मक शक्ति बहुत दूरगामी थी।" यूरोपीय राजनीतिक सोच ने जिस राष्ट्र को क्षेत्र, नागरिकता और संप्रभुता के रूप में परिभाषित किया था, उसे बंकिम ने एक ऐसी मां बना दिया जिसकी पूजा की जा सकती थी और जिसके लिए प्राण न्यौछावर किए जा सकते थे। 'वंदे मातरम' की प्रतिभा इसी रूपांतरण में निहित है। आनंदमठ में सन्यासियों को अपने घर-परिवार के प्रति साधारण लगाव को छोड़कर इस 'बड़ी मां' (राष्ट्र) के प्रति लगाव रखने को कहा गया है। राष्ट्र यहाँ केवल भूगोल नहीं, बल्कि कुछ 'पवित्र' बन जाता है। इसीलिए प्रथम दो पदों को बाद के पदों से अलग करके विवाद सुलझाने की कोशिश करना बौद्धिक रूप से व्यर्थ है, क्योंकि राष्ट्र को पवित्र बनाने की यह प्रक्रिया पूरे गीत की संरचना में रची-बसी है।
एक आधुनिक उत्पाद और प्रतीकात्मक युद्ध
यह एक विडंबना है कि जिस गीत को आज हिंदू राष्ट्रवाद का बोझ ढोने के लिए मजबूर किया जा रहा है, वह असल में आधुनिकता का उत्पाद है। इसे 19वीं सदी के एक लेखक के राष्ट्रीय चेतना के निर्माण के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। वामपंथी और उदारवादी प्रतिक्रिया अक्सर इस बात तक सीमित रह जाती है कि बाद के पद हिंदू हैं और इसलिए सार्वजनिक उपयोग के लिए अनुपयुक्त हैं। यह तर्क संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति निष्ठा रखने वालों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन यह गीत के वास्तविक इतिहास को अनछुआ छोड़ देता है। यह गीत के प्रतीकात्मक धरातल को बिना किसी संघर्ष के दक्षिणपंथ के हवाले कर देता है।
कांग्रेस ने बार-बार स्वयं को गलत मोर्चों पर धकेलने की अनुमति दी है। एक 19वीं सदी के लेखक ने मातृभूमि के विचार को इस रूप में क्यों गढ़ा, इसके पीछे के तर्क तलाशने के बजाय, पार्टी एक राष्ट्रगीत को बीच में ही रोकने की मूर्खतापूर्ण बहस में उलझ जाती है। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। कांग्रेस केवल दक्षिणपंथ की उस मांग पर प्रतिक्रिया देती है कि देशभक्ति को कर्मकांड (रिचुअल) के माध्यम से प्रदर्शित किया जाए। यह कहने के बजाय कि हमारा राष्ट्र इतना विशाल है कि वह एक पुराने गीत पर असहमति को समाहित कर सकता है, पार्टी उस असहमति को ही देशभक्ति पर एक जनमत संग्रह बनने देती है।
वफादारी की परीक्षा बनाम राष्ट्रीय कल्पना
भाजपा इस तर्क को बहस शुरू होने से पहले ही जीत लेती है क्योंकि वह यह तय करने का अधिकार पा लेती है कि बहस किस बारे में होगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण कसरत के माध्यम से, 'वंदे मातरम' को राष्ट्रवादी कल्पना के एक आकर्षक और विरोधाभासी कार्य के बजाय एक 'वफादारी की परीक्षा' (लॉयल्टी टेस्ट) में बदल दिया गया है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि प्रतीकों की इस लड़ाई में वह केवल तभी टिक पाएगी जब वह अपनी विरासत पर गर्व करना सीखेगी और उसे किसी खास चश्मे से देखने के बजाय उसकी समग्रता में स्वीकार करेगी। राष्ट्रगीत को पदों में बांटना असल में राष्ट्र की कल्पना को ही सीमित करना है।





