संतु दास

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और शैक्षिक राजधानी पुणे इन दिनों भारतीय राजनीति के दो विपरीत ध्रुवों के बीच छिड़े एक बड़े वैचारिक युद्ध का साक्षी बनी है। जहाँ एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'छात्रों की गूँज' कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं, विशेषकर महिलाओं को "पितृसत्ता को ध्वस्त" करने और "मनुस्मृति" जैसे पुरातन विचारों को त्यागने का आह्वान किया, वहीं उससे मात्र पांच किलोमीटर दूर भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने 'युवा की आवाज' रैली के जरिए देशभक्ति का शंखनाद किया। पुणे के इस सियासी मैदान में एक तरफ सामाजिक न्याय और वैचारिक क्रांति की बातें थीं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के पूर्ण गायन और सांस्कृतिक गौरव का प्रदर्शन। यह विरोधाभास केवल दो रैलियों का नहीं था, बल्कि यह भारत के भविष्य की दिशा और युवाओं के मन को जीतने के लिए लड़ी जा रही दो अलग-अलग विचारधाराओं का सीधा मुकाबला था।

पुणे की प्रगतिशील विरासत और आधुनिक आकांक्षाएं

पुणे का अपना एक विशिष्ट चरित्र है। यह शहर पेशवाओं के अधीन मराठा पुनर्जागरण का केंद्र रहा है और दशकों से शिक्षा, संस्कृति तथा कला का स्रोत बना हुआ है। पुणे की पहचान उसके मध्यमवर्गीय कार्य-नैतिकता और महिलाओं को मिलने वाली स्वतंत्रता से रही है। भारत के अन्य शहरों की तुलना में यहाँ की महिलाओं ने बहुत पहले ही आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता का परिचय दिया था, जहाँ हर उम्र की महिलाएं दोपहिया वाहनों पर सड़कों पर नजर आती हैं। लेकिन इस प्रगतिशीलता के साथ-साथ पुणे अपनी जड़ों से भी मजबूती से जुड़ा हुआ है। यह सावरकर जैसे हिंदुत्व के प्रतीक स्तंभों की भूमि रही है, जिन्होंने फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ाई की और येरवडा जेल में समय बिताया। आज का पुणे एक तरफ सावरकर और पेशवाओं की विरासत को सहेजता है, तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनकर उभरा है। ऐसे शहर में राहुल गांधी का पितृसत्ता और मनुस्मृति पर हमला और एबीवीपी का वंदे मातरम के जरिए राष्ट्रवाद का दांव, यहाँ के शिक्षित और जागरूक युवाओं के बीच एक नई बहस का कारण बना है।

राष्ट्रगीत और तुष्टीकरण का नया मोर्चा

एबीवीपी ने पुणे के इस आयोजन को कांग्रेस के लिए एक आईने की तरह इस्तेमाल किया। हाल ही में संसद के मानसून सत्र के दौरान पारित एक कानून के बावजूद, कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम के सभी छह पदों को न गाए जाने पर भाजपा ने आक्रामक रुख अपनाया। गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे को सीधे 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' से जोड़ते हुए कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया। शाह ने आरोप लगाया कि 1937 में वंदे मातरम के पदों को सीमित करने का कांग्रेस का निर्णय मुस्लिम लीग के सामने झुकने का परिणाम था और यह आज भी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की उसी पुरानी नीति का हिस्सा है। शाह की यह दलील भाजपा के उस बड़े विमर्श को पुष्ट करती है जहाँ वे सावरकर, अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर एक स्पष्ट और निर्भीक राष्ट्रवाद की बात करते हैं। भाजपा ने कांग्रेस की उस कमजोरी को पकड़ा है जहाँ राष्ट्रगीत की "धार्मिक" शब्दावली से एक वर्ग विशेष को होने वाली असुविधा पर कांग्रेस चुप्पी साध लेती है।

असंतोष का नया व्याकरण: सीजेपी (CJP) और छात्र आंदोलन

जून 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, जहाँ भाजपा को कम बहुमत के साथ सत्ता में लौटना पड़ा, वहीं सरकार के सामने पहली बड़ी चुनौती 'कोकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के रूप में सामने आई। नीट (NEET) जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों ने छात्रों के बीच जबरदस्त असंतोष पैदा किया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह विरोध और लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का उपवास देखते ही देखते छात्र आक्रोश का केंद्र बन गया। वामपंथी छात्र संगठनों की सक्रियता ने इस आंदोलन को न केवल सांगठनिक ताकत दी, बल्कि सड़कों पर एक ऐसी उपस्थिति दर्ज कराई जिससे मोदी सरकार की सत्ता को कड़ी चुनौती मिलती दिखी।

पुणे में राहुल गांधी की छात्रों के साथ बातचीत इसी युवा असंतोष को भुनाने की एक कोशिश है। राहुल अब उन छात्रों के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो परीक्षाओं में गड़बड़ी और नौकरियों की कमी से परेशान हैं। यह 'जनरेशन जेड' (Gen Z) तक पहुँचने की एक सोची-समझी रणनीति है। हालांकि, राहुल की इस राह में चुनौती न केवल भाजपा है, बल्कि वे नए राजनीतिक खिलाड़ी भी हैं जो स्थापित दलों को दरकिनार कर रहे हैं। तमिलनाडु में अभिनेता विजय और बिहार में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि आज का युवा केवल पारंपरिक विपक्ष की ओर नहीं देख रहा, बल्कि वह नए और गैर-पारंपरिक नेतृत्व की तलाश में भी है।

रणनीति का दोहराव: रफाल से नीट तक

राहुल गांधी की रणनीति पिछले कुछ वर्षों से एक ही ढर्रे पर चल रही है—नरेंद्र मोदी पर सीधा और व्यक्तिगत हमला करना। 2019 के चुनावों में रफाल सौदे को लेकर "चौकीदार चोर है" का नारा और एचएएल (HAL) के नुकसान के दावों ने कांग्रेस के अभियान की रूपरेखा तैयार की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जनता के जनादेश ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था, लेकिन राहुल ने अपनी रणनीति नहीं बदली। रफाल के बाद अब वे नीट (NEET) और भ्रष्टाचार के अन्य आरोपों के जरिए प्रधानमंत्री की "विश्वसनीयता" (क्रेडिबिलिटी) पर प्रहार कर रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री की बेदाग छवि को धूमिल किया जा सके, तो भाजपा के दुर्ग को ढहाना आसान होगा।

लेकिन यहाँ एक बड़ा पेंच है। कांग्रेस अक्सर भाजपा के उस मजबूत कल्याणकारी तंत्र को कम आंकती है जिसने करोड़ों लोगों को सीधे लाभ पहुंचाया है। उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन, पक्के मकान और आयुष्मान भारत जैसे कार्डों ने गरीबों के बीच मोदी की एक ऐसी विश्वसनीयता बनाई है जिसे केवल राजनीतिक नारों से तोड़ना मुश्किल है। राहुल का "प्रेम की दुकान" और "पुणे मंजे प्रेम" (पुणे मतलब प्रेम) का आह्वान इस कल्याणकारी और सुरक्षात्मक राष्ट्रवाद के सामने अब भी संघर्ष करता दिख रहा है।

मंडल की वापसी और सामाजिक समीकरण

राहुल गांधी ने भाजपा के व्यापक हिंदू गठबंधन को तोड़ने के लिए एक बार फिर "मंडल" की राजनीति का सहारा लिया है। वे नौकरशाही और निजी क्षेत्र में जातिगत प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि देश की "90 प्रतिशत" आबादी (दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और गरीब) व्यवस्था से बाहर है। उनकी "रोहित वेमुला" कानून की मांग और जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की जिद एक ऐसे वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश है जो विकास की दौड़ में खुद को पीछे महसूस करता है।

हालांकि, यह रणनीति दोधारी तलवार है। जातिगत आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर राहुल का यह कड़ा रुख उच्च वर्गों को कांग्रेस से दूर कर सकता है। भाजपा ने इसके जवाब में "सर्व समाज" और "अन्त्योदय" का कार्ड खेला है। 'पीएम विश्वकर्मा' जैसी योजनाएं जो विशेष रूप से पिछड़े वर्ग के कारीगरों के लिए हैं, भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा हैं जहाँ वह जाति की पहचान को विकास और आत्मनिर्भरता से जोड़ती है। मोदी का "विकसित भारत" का संकल्प एक तरफ आकांक्षाओं को जगाता है, तो दूसरी तरफ वह जातिगत विभाजन के बजाय एक एकीकृत भारतीय पहचान की बात करता है।

युवा संवाद: अनुभव बनाम आकांक्षा

उम्र में राहुल गांधी से काफी बड़े होने के बावजूद, नरेंद्र मोदी ने युवा मतदाताओं के साथ एक अनूठा जुड़ाव बनाया है। 'परीक्षा पे चर्चा', स्टार्टअप्स के साथ नियमित बैठकें और खिलाड़ियों के साथ संवाद के जरिए वे खुद को एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में पेश करते हैं जो उत्कृष्टता की बात करता है। भाजपा की रणनीति युवाओं को "अवसर" और "कौशल" देने की है, जबकि कांग्रेस उन्हें उनके "अधिकार" और "अन्याय" के बारे में सचेत कर रही है। पुणे जैसे शिक्षा केंद्र में ये दोनों विमर्श आमने-सामने हैं। एक तरफ वे युवा हैं जो पेपर लीक और बेरोजगारी से गुस्से में हैं, तो दूसरी तरफ वे भी हैं जो स्पेस-टेक, डिजिटलीकरण और ग्लोबल इंडिया के सपनों में खुद को देखते हैं।

पुणे की सड़कों पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन और रैलियां यह दर्शाती हैं कि भारत का युवा अब केवल शांत दर्शक नहीं है। शहरी जीवन, आय और आकांक्षाओं के बीच का अंतर वास्तविक है और समय-समय पर नोएडा या मानेसर जैसी जगहों पर यह आक्रोश बनकर फूटता भी है। कांग्रेस इसी restless (बेचैन) वर्ग को अपना नया राजनीतिक आधार बनाना चाहती है। लेकिन चुनौती यह है कि 'जनरेशन जेड' कोई एक जैसी सोच रखने वाला समूह नहीं है। वह तकनीक से जुड़ा है, महत्वाकांक्षी है और अक्सर विचारधारा से ज्यादा परिणामों (रिजल्ट्स) को प्राथमिकता देता है।

निष्कर्ष: संप्रभुता और अस्मिता की लड़ाई

पुणे का यह राजनीतिक तमाशा आने वाले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों की एक छोटी झलक मात्र है। राहुल गांधी का 'पितृसत्ता' और 'कम्पलीट' वंदे मातरम पर भाजपा का 'राष्ट्रवाद'—ये दो अलग-अलग भारत की कल्पनाएं हैं। भाजपा जहाँ एक सांस्कृतिक रूप से मुखर और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, वहीं कांग्रेस एक ऐसी व्यवस्था की मांग कर रही है जो अधिक समावेशी हो और जहाँ जाति तथा लैंगिक समानता केंद्र में हो।

2027 और उसके बाद के चुनावों का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल युवाओं के मन के इस द्वंद्व को सुलझा पाता है। क्या राहुल का मंडल कार्ड और प्रेम का संदेश मोदी के कल्याणकारी राष्ट्रवाद और विकसित भारत के संकल्प पर भारी पड़ेगा? पुणे ने इस युद्ध की जमीन तैयार कर दी है। यहाँ की 'छात्रों की गूँज' और 'युवा की आवाज' के बीच असली फैसला उस 'जनरेशन जेड' के हाथों में है जो एक तरफ अपनी जड़ों और संस्कृति को सहेजना चाहती है, तो दूसरी तरफ एक आधुनिक और न्यायपूर्ण भविष्य की तलाश में है।